Transliteration: (Wa mal lam yastati' minkum tawlan ai yankihal muhsanaatil mu'minaati famimmaa malakat aimaanukum min fatayaatikumul mu'minaat; wallaahu a'lamu bi eemaanikum; ba'dukum mim ba'd; fankihoohunna bi izni ahlihinna wa aatoohunna ujoorahunna bilma'roofi muhsanaatin ghaira musaa fihaatinw wa laa muttakhizaati akhdaan; fa izaaa uhsinna fa in ataina bifaahi shatin fa'alaihinnna nisfu maa 'alal muhsanaati minal 'azaab; zaalika liman khashiyal 'anata minkum; wa an tasbiroo khairul lakum; wallaahu Ghafoorur Raheem)
इस आयत में उन लोगों के लिए राहत दी गई है जो आज़ाद मोमिन औरतों से निकाह करने की आर्थिक हैसियत नहीं रखते। ऐसे लोग अपनी मिल्कियत में मौजूद मोमिन लौंडियों से निकाह कर सकते हैं, क्योंकि ईमान के नज़रिए से सब बराबर हैं — चाहे वह गुलाम हों या आज़ाद।
निकाह से पहले मालिक की इजाज़त लेना फ़र्ज़ है, क्योंकि ग़ुलामी और शादी एक साथ नहीं चल सकते।
ग़ुलाम औरत से मालिक का सहवास (हमबिस्तरी) तो जायज़ है, लेकिन निकाह एक अलग रिश्ता है जिसमें बराबरी और हक़ होते हैं, जो ग़ुलामी में नहीं मिलते। इसलिए मालिक ख़ुद अपनी लौंडी से निकाह नहीं कर सकता।
चूँकि गुलाम को अपनी मिल्कियत का कोई हक़ नहीं होता, इसलिए उसका माहर उसके मालिक को दिया जाएगा। यह शरई और कानूनी रूप से बिल्कुल दुरुस्त है, क्योंकि वही उसका क़ानूनी संरक्षक होता है।
इस हिस्से में साफ़ मना किया गया है कि निकाह सिर्फ़ हवस या ग़ैर-शरई रिश्तों के लिए नहीं किया जा सकता।
अगर कोई कुँवारी लौंडी ज़िना करे, तो उसे 50 कोड़े की सज़ा दी जाएगी, जो कि आज़ाद औरत (100 कोड़े) की आधी है।
अगर शादीशुदा लौंडी ज़िना करे, तो उसे रज्म (पत्थरों से मारकर सज़ा) नहीं दी जाती, क्योंकि रज्म को आधा नहीं किया जा सकता।
इससे यह फ़िक़्ही हुक्म निकलता है कि लौंडी की सज़ा हर हाल में आज़ाद औरत से कम होती है।
यहाँ 'आज़ाद औरत' से मुराद शादी से पहले की कुँवारी औरत है, न कि शादीशुदा।
इस आयत से यह हुक्म निकलता है कि लौंडी से निकाह की इजाज़त तो है, लेकिन यह माक़ूल सूरत नहीं है, बल्कि मजबूरी की सूरत में रियायत है।
इमाम शाफ़ई (रह.) ने तीन शर्तें बताईं:
इमाम अबू हनीफा (रह.) ने ये शर्तें नहीं लगाईं।
इसके अलावा:
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