Transliteration: (Yureedul laahu liyubai yina lakum wa yahdiyakum sunanal lazeena min qablikum wa yatooba 'alaikum; wallaahu 'Aleemun Hakeem)
इस आयत में वैध और अवैध पत्नियों तथा विवाह से जुड़ी दूसरी बातों के बारे में क़ानूनों का उल्लेख है।
इंसानों और जानवरों की संतानोत्पत्ति में जो फर्क है, वह निकाह की संस्था है।
इसी कारण अल्लाह ने इन नियमों को विस्तार से बयान किया है,
और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने इन्हें और स्पष्ट किया।
यह इस्लामी पारिवारिक क़ानून की महत्ता और पवित्रता को दर्शाता है।
हम इससे यह सीखते हैं कि:
अगर किसी पहले नबी की शरई अमल (जो क़ुरआन या हदीस में वर्णित है) का खंडन नहीं किया गया है,
तो वह हमारे लिए भी मान्य और लागू है।
उदाहरण: जैसे अल्लाह ने ज़बूर में कहा: जान के बदले जान — यह हुक्म आज भी प्रचलित है।
लेकिन:
अगर किसी पिछली उम्मत के अमल के बाद खंडन किया गया है,
तो वह हमारे लिए मान्य नहीं है।
उदाहरण: "यहूदियों की अत्यंत नाइंसाफ़ी के कारण, हमने उन पर कुछ पवित्र चीज़ें हराम कर दीं..." (सूरह अन-निसा: आयत 160) —
यह स्पष्ट करता है कि वे आदेश केवल उनके अन्याय के कारण थे, हमारे लिए नहीं।
हमें यह याद दिलाया गया है कि:
क़ुरआन के सभी आदेश, अल्लाह की हिकमत और ज्ञान पर आधारित हैं।
इसलिए इन्हें पूरे दिल से, बिना किसी संकोच या विरोध के स्वीकार करना चाहिए।
अल्लाह सब जानने वाला है, इसलिए उसके आदेशों में कोई कमी नहीं होती।
वह हिकमत वाला है, इसलिए हर क़ानून का कोई न कोई उद्देश्य होता है, भले ही वह तुरंत न समझ में आए।
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