Transliteration: (Wa in khiftum allaa tuqsitoo fil yataamaa fankihoo maa taaba lakum minan nisaaa'i masnaa wa sulaasa wa rubaa'a fa'in khiftum allaa ta'diloo fawaahidatan aw maa malakat aimaanukum; zaalika adnaaa allaa ta'ooloo)
कुछ लोग अनाथ लड़कियों से केवल उनके माल के लालच में निकाह कर लेते थे और उनके हक़-ए-ज़ौजियत को अदा नहीं करते थे। इस ज़ुल्म और शोषण को रोकने के लिए यह आयत नाज़िल हुई। हुक्म साफ़ है: जिन औरतों को पसंद करो, उनसे निकाह करो, न कि सिर्फ़ दौलत के लिए।
चार बीवियों की हद का यह हुक्म हुज़ूर ﷺ पर लागू नहीं होता। उन्हें जो चाहें, निकाह में रखने की अनुमति थी। चार तक की इजाज़त इसलिए दी गई क्योंकि:
जो व्यक्ति बराबरी का सुलूक नहीं कर सकता, उसे एक से ज़्यादा निकाह की मनाही है। अगर कोई नाइंसाफ़ी करता है, तो यह गुनाह है, लेकिन निकाह और औलाद जायज़ मानी जाएगी।
लौंडियों की कोई हद तय नहीं है, लेकिन उनके हुकूक बीवी की तरह नहीं होते। उन पर बीवी वाले हक़ लाज़िमी नहीं होते, और उनका दर्जा अलग होता है।
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