कुरान - 4:3 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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وَإِنۡ خِفۡتُمۡ أَلَّا تُقۡسِطُواْ فِي ٱلۡيَتَٰمَىٰ فَٱنكِحُواْ مَا طَابَ لَكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ مَثۡنَىٰ وَثُلَٰثَ وَرُبَٰعَۖ فَإِنۡ خِفۡتُمۡ أَلَّا تَعۡدِلُواْ فَوَٰحِدَةً أَوۡ مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُكُمۡۚ ذَٰلِكَ أَدۡنَىٰٓ أَلَّا تَعُولُواْ

Transliteration: (Wa in khiftum allaa tuqsitoo fil yataamaa fankihoo maa taaba lakum minan nisaaa'i masnaa wa sulaasa wa rubaa'a fa'in khiftum allaa ta'diloo fawaahidatan aw maa malakat aimaanukum; zaalika adnaaa allaa ta'ooloo)

अगर तुम्हें डर हो कि तुम अनाथ लड़कियों के साथ न्याय नहीं कर पाओगे [9], तो जिन औरतों से तुम्हें प्रसन्नता हो, उनसे निकाह कर लो — दो, तीन या चार [10]। लेकिन अगर तुम्हें डर हो कि तुम (सभी के साथ) न्याय नहीं कर पाओगे, तो एक ही से निकाह करो [11], या जो तुम्हारे अधिकार में हैं (लौंडियाँ) [12]। यह अधिक उपयुक्त है कि तुम अन्याय से बच सको। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 3 की तफ़्सीर

 

✅ [9] अनाथ लड़कियों के साथ न्याय की शर्त

कुछ लोग अनाथ लड़कियों से केवल उनके माल के लालच में निकाह कर लेते थे और उनके हक़-ए-ज़ौजियत को अदा नहीं करते थे। इस ज़ुल्म और शोषण को रोकने के लिए यह आयत नाज़िल हुई। हुक्म साफ़ है: जिन औरतों को पसंद करो, उनसे निकाह करो, न कि सिर्फ़ दौलत के लिए।

✅ [10] चार बीवियों तक की इजाज़त

चार बीवियों की हद का यह हुक्म हुज़ूर ﷺ पर लागू नहीं होता। उन्हें जो चाहें, निकाह में रखने की अनुमति थी। चार तक की इजाज़त इसलिए दी गई क्योंकि:

  • औरतों की संख्या मर्दों से ज़्यादा होती है
  • जंगों में मर्द क़त्ल हो जाते हैं
  • बहुत-सी औरतें बिन ब्याही रह जातीं
  • आबादी बढ़ाना क़ौमी ताक़त का ज़रिया है
    औरत को एक से ज़्यादा शौहर की अनुमति नहीं क्योंकि:
  • नसब में गड़बड़ी हो जाएगी
  • बाप का पता नहीं चलेगा
  • बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी तय नहीं होगी

✅ [11] बराबरी की शर्त

जो व्यक्ति बराबरी का सुलूक नहीं कर सकता, उसे एक से ज़्यादा निकाह की मनाही है। अगर कोई नाइंसाफ़ी करता है, तो यह गुनाह है, लेकिन निकाह और औलाद जायज़ मानी जाएगी।

✅ [12] लौंडियों के बारे में

लौंडियों की कोई हद तय नहीं है, लेकिन उनके हुकूक बीवी की तरह नहीं होते। उन पर बीवी वाले हक़ लाज़िमी नहीं होते, और उनका दर्जा अलग होता है।

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