कुरान - 4:77 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ قِيلَ لَهُمۡ كُفُّوٓاْ أَيۡدِيَكُمۡ وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيۡهِمُ ٱلۡقِتَالُ إِذَا فَرِيقٞ مِّنۡهُمۡ يَخۡشَوۡنَ ٱلنَّاسَ كَخَشۡيَةِ ٱللَّهِ أَوۡ أَشَدَّ خَشۡيَةٗۚ وَقَالُواْ رَبَّنَا لِمَ كَتَبۡتَ عَلَيۡنَا ٱلۡقِتَالَ لَوۡلَآ أَخَّرۡتَنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٖ قَرِيبٖۗ قُلۡ مَتَٰعُ ٱلدُّنۡيَا قَلِيلٞ وَٱلۡأٓخِرَةُ خَيۡرٞ لِّمَنِ ٱتَّقَىٰ وَلَا تُظۡلَمُونَ فَتِيلًا

Transliteration: (Alam tara ilal lazeena qeela lahum kuffooo aidiyakum wa aqeemus Salaata wa aaatuz Zakaata falammaa kutiba 'alaihimul qitaalu izaa fareequm minhum yakhshaw nan naasa kakhashyatil laahi aw ashadda khashyah; wa qaaloo Rabbanaa lima katabta 'alainal qitaala law laaa akhkhartanaa ilaaa ajalin qareeb; qul mataa'ud dunyaa qaleelunw wal Aakhiratu khairul limanit taqaa wa laa tuzlamoona fateelaa)

क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें कहा गया था कि अपने हाथ रोक लो [245], नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो, फिर जब उन पर लड़ाई फ़र्ज़ की गई [246] तो उनमें से एक गिरोह ने लोगों से इस तरह डरना शुरू कर दिया जैसे अल्लाह से डरना चाहिए, बल्कि उससे भी ज़्यादा। और उन्होंने कहा: ऐ हमारे पालनहार! तूने हम पर लड़ाई क्यों फ़र्ज़ कर दी [249]? काश तूने हमें थोड़ी देर तक मोहलत दे दी होती। कह दो कि दुनिया का लाभ तो थोड़ा है, और जो अल्लाह से डरता है उसके लिए आख़िरत बेहतर है, और तुम्हारे साथ राई के दाने के छिलके [250] के बराबर भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 77 की तफ़्सीर

 

✅ [245] शुरुआती हुक्म – हाथ रोकना और इबादत पर ध्यान देना

हिजरत से पहले, जब ईमान वाले काफ़िरों के अत्याचार सह रहे थे, उन्होंने हुज़ूर ﷺ से जवाबी कार्रवाई की इजाज़त चाही। लेकिन आपको हुक्म हुआ कि हाथ रोक लो, और नमाज़ पढ़ो व ज़कात अदा करो। इससे मालूम हुआ कि जिहाद तभी फ़र्ज़ हुआ जब नमाज़ और ज़कात फ़र्ज़ हो चुके थे। नमाज़ मीराज की रात हिजरत से पहले फ़र्ज़ हुई, और ज़कात व जिहाद दोनों हिजरत के दूसरे साल, क़िबला बदलने के बाद फ़र्ज़ हुए। रोज़ा भी दूसरे हिजरी साल में फ़र्ज़ हुआ।

✅ [246] मक्का में जिहाद क्यों फ़र्ज़ नहीं था

हिजरत से पहले सिर्फ़ नमाज़ फ़र्ज़ थी, क्योंकि मक्का में मुसलमानों के पास न राजनीतिक ताक़त थी, न फ़ौजी शक्ति। उस वक़्त जिहाद फ़र्ज़ नहीं किया गया। यह तब फ़र्ज़ हुआ जब मुसलमान मदीना पहुँचकर रक्षात्मक ताक़त हासिल कर चुके थे।

✅ [247] डर की तफ़्सीर – मुनाफ़िक़ और मोमिन का फ़र्क़

अगर इस आयत में कुछ लोगों से मुराद मुनाफ़िक़ हैं, तो उनका लोगों से डरना ईमान की कमज़ोरी और अल्लाह के हुक्म से इंकार है। लेकिन अगर इससे मुराद मोमिन हैं, तो यह डर फ़ितरी इंसानी हालत है, गुनाह नहीं। इस सूरत में उनका सवाल इंकार नहीं, बल्कि हिकमत की तलाश है। तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इर्फ़ान के मुताबिक़ यही दूसरा मतलब ज़्यादा सही है।

✅ [248] इंसानी डर ईमान के खिलाफ़ नहीं

सहाबा-ए-किराम भी कभी-कभी इंसानी फ़ितरत के तौर पर डर महसूस करते थे। यह ईमान के खिलाफ़ नहीं। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने भी फ़िरऔन के सामने डर महसूस किया: हम डरते हैं कि वह हम पर ज़्यादती करेगा (सूरा ताहा, 20:45)। यह डर नुक़सान का होता है, न कि अल्लाह की नाफ़रमानी का। अल्लाह के हुक्म से रोकने वाला डर ही नापसंद है।

✅ [249] मिर्ज़ा ग़ुलाम क़ादियानी का डर बनाम मोमिनों की बहादुरी

इससे पता चला कि मिर्ज़ा ग़ुलाम क़ादियानी मोमिन नहीं था, क्योंकि सच्चा मोमिन अल्लाह के हुक्म पर मख़लूक़ से नहीं डरता और जिहाद को रद्द समझकर छोड़ता नहीं। जिहाद क़यामत तक बाक़ी रहने वाला हुक्म है। सहाबा के दिल में अल्लाह का डर और मख़लूक़ के सामने बहादुरी दोनों मौजूद थे।

✅ [250] राई के छिलके के बराबर भी ज़ुल्म नहीं

अल्लाह किसी का हक़ नहीं मारेगा और न ही बेवजह सज़ा देगा। इसलिए ईमान वालों को चाहिए कि:

  • जिहाद में खुशी से हिस्सा लें
  • अल्लाह के इंसाफ़ पर भरोसा रखें
  • जान लें कि उनके हक़ में या ख़िलाफ़ राई के दाने के छिलके के बराबर भी ज़ुल्म नहीं होगा।

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