कुरान - 4:78 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

78
أَيۡنَمَا تَكُونُواْ يُدۡرِككُّمُ ٱلۡمَوۡتُ وَلَوۡ كُنتُمۡ فِي بُرُوجٖ مُّشَيَّدَةٖۗ وَإِن تُصِبۡهُمۡ حَسَنَةٞ يَقُولُواْ هَٰذِهِۦ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةٞ يَقُولُواْ هَٰذِهِۦ مِنۡ عِندِكَۚ قُلۡ كُلّٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِۖ فَمَالِ هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلۡقَوۡمِ لَا يَكَادُونَ يَفۡقَهُونَ حَدِيثٗا

Transliteration: (Ayna maa takoonoo yudrikkumul mawtu wa law kuntum fee buroojim mushai yadah; wa in tusibhum hasanatuny yaqooloo haazihee min indil laahi wa in tusibhum saiyi'atuny yaqooloo haazihee min 'indik; qul kullum min 'indillaahi famaa lihaaa 'ulaaa'il qawmi laa yakaadoona yafqahoona hadeesaa)

जहाँ कहीं भी तुम हो, मौत तुम्हें आ पकड़ेगी, चाहे तुम मज़बूत क़िलों [251] में ही क्यों न हो। अगर उन्हें कोई भलाई पहुँचती है तो कहते हैं कि यह अल्लाह की तरफ़ से है, और अगर कोई मुसीबत पहुँचती है तो कहते हैं कि यह तेरी वजह से [252] है। कह दीजिए कि सब कुछ अल्लाह की तरफ़ से है। फिर इन लोगों को क्या हो गया है कि कोई बात समझते ही नहीं [253]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 78 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 78 की तफ़्सीर

 

✅ [251] मौत अनिवार्य है – सबसे सुरक्षित जगह में भी

यह आयत याद दिलाती है कि मौत से बचना असंभव है, चाहे इंसान मज़बूत और सुरक्षित क़िलों में छिपा हो। इसलिए अल्लाह की राह में शहीद होना बिस्तर पर लंबी बीमारी से मरने से बेहतर है। हदीस के अनुसार, शहीद की मौत का दर्द चींटी के डंक जैसा हल्का होता है, जो अल्लाह की राह में मरने वालों का सम्मान और आसानी बताता है।

✅ [252] मुसीबतों का इल्ज़ाम नबी ﷺ पर लगाना – निफ़ाक़ की निशानी

मुनाफ़िक़ कहते थे कि हुज़ूर ﷺ के मदीना आने के बाद मुसीबतें बढ़ गई हैं — अल्लाह माफ़ करे — और नुक़सान का कारण आपको ठहराते थे। हक़ीक़त यह है कि आपके आने के बाद:

  • यसरिब (मदीना) पाक शहर बना
  • यह बरकत और शिफ़ा का मरकज़ बन गया
  • यहाँ की रेत तक में शिफ़ा का असर पैदा हो गया
    इसलिए ऐसे इल्ज़ाम बेबुनियाद थे और कुफ़्र की जड़ से निकले थे।

✅ [253] हर भलाई और मुसीबत अल्लाह के इल्म और मशीयत में

इससे मालूम हुआ कि:

  • हर नेमत और आज़माइश अल्लाह के इल्म और इरादे से होती है
  • कभी-कभी हमारे अपने आमाल उसका कारण बनते हैं
  • तक़वा सुकून और आसानी लाता है
  • गुनाह मुसीबत का सबब बनते हैं
    इस आयत और पहले की आयत "तुम्हारे अपने नफ़्स से" (सूरा अन-निसा, 4:79) में कोई टकराव नहीं है —
    एक में कारण (इंसानी अमल) का बयान है, दूसरी में अल्लाह के इल्म और क़ुदरत पर ज़ोर है।

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