Transliteration: (Wa law laa fadlul laahi 'alaikum wa rahmatuhoo wa annal laaha Ra'oofur Raheem (section 2))
"और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत [36] न होती... और यह कि अल्लाह निहायत शफ़क़त फ़रमाने वाला, मेहरबान है।"
यह आयत फिर याद दिलाती है कि हज़रत रसूल-ए-अकरम ﷺ और उम्मुल मोमिनीन की अज़मत पर हमला कोई मामूली बात न थी। अगर अल्लाह की ख़ास शफ़क़त (रऊफ़ियत) और रहमत न होती तो ऐसा अज़ाब नाज़िल होता जिसकी मिसाल न मिलती। अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल से मुसलमानों को तौबा की तौफ़ीक़ दी और माफ़ फ़रमाया।
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