कुरान - 24:21 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
۞يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّبِعُواْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ وَمَن يَتَّبِعۡ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيۡطَٰنِ فَإِنَّهُۥ يَأۡمُرُ بِٱلۡفَحۡشَآءِ وَٱلۡمُنكَرِۚ وَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَرَحۡمَتُهُۥ مَا زَكَىٰ مِنكُم مِّنۡ أَحَدٍ أَبَدٗا وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يُزَكِّي مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٞ

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattabi'oo khutuwaatish Shaitaan; wa many-yattabi' khutuwaatish Shaitaani fa innahoo yaamuru bilfahshaaa'i walmunkar; wa law laa fadlul laahi 'alaikum wa rahmatuhoo maa zakaa minkum min ahadin abadanw wa laakinnal laaha yuzakkee many-yashaaa'; wallaahu Samee'un 'Aleem)

ऐ ईमान वालो! शैतान के क़दमों पर न चलो [37]; और जो शख़्स शैतान के क़दमों पर चलेगा, तो बेशक शैतान तो बेहयाई और बुराई ही का हुक्म देता है [38]; और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत न होती, तो तुम में से कोई भी कभी पाक-साफ़ न हो सकता, लेकिन अल्लाह जिसे चाहता है पाक-साफ़ कर देता है; और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है [39]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 21

"ऐ ईमान वालो! शैतान के क़दमों पर न चलो [37]। और जो शख़्स शैतान के क़दमों पर चलेगा, तो बेशक शैतान तो बेहयाई और बुराई ही का हुक्म देता है [38]। और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत न होती, तो तुम में से कोई भी कभी पाक-साफ़ न हो सकता, लेकिन अल्लाह जिसे चाहता है पाक-साफ़ कर देता है। और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, जानने वाला है [39]।"

[37] शैतानी रास्तों से मुकम्मल दूरी

अल्लाह तआला ने मोमिनों को साफ़ हुक्म दिया कि शैतान के नक़्श-ए-क़दम पर कभी न चलो। यानी गुनाह की तरफ़ पहला क़दम भी न उठाओ—चाहे वह गीबत हो, बदगुमानी हो, तोहमत तराशी हो या बेहयाई—क्योंकि शैतान इंसान को आहिस्ता-आहिस्ता अपने जाल में फंसाता है।

[38] शैतानी दावत: बेहयाई और बुराई

शैतान की पैरवी करने वाला लाज़मी तौर पर फ़हश (बेहयाई) और मुनकर (बुराई) में मुब्तला हो जाता है। इसका ताल्लुक़ वाक़िआ-ए-इफ़्क से भी है, जहाँ शैतान के बहकावे में आकर लोगों ने बिना तहक़ीक़ ऐसी बातें ज़बान से निकालीं जिससे पाकदामनी की तौहीन हुई।

[39] पाकीज़गी का अस्ल सरचश्मा इलाही फ़ज़्ल

इंसान अपने दिल, ज़बान और आमाल को अपने बलबूते पर कभी पाक-साफ़ नहीं रख सकता जब तक कि अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रहमत शामिल-ए-हाल न हो। अल्लाह जिसे चाहता है अपने करम से पाकीज़ा फ़रमाता है। वह हर बात को सुनने वाला और हर नीयत को जानने वाला है।

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