Transliteration: (Wa laa yaatali ulul fadli minkum wassa'ati ai yu'tooo ulil qurbaa walmasaakeena walmuhaajireena fee sabeelillaahi walya'foo walyasfahoo; alaa tuhibboona ai yaghfiral laahu lakum; wal laahu Ghafoorur Raheem)
"और तुम में से जो लोग फ़ज़ीलत [40] और वुसअत [41] वाले हैं, वे इस बात की क़सम न खाएं कि वे रिश्तेदारों, मिस्कीनों और मुहाजिरीन को कुछ नहीं देंगे; बल्कि माफ़ कर दें और दरगुज़र करें। क्या तुम यह पसंद नहीं करते कि अल्लाह तुम्हें बख़्श दे? और अल्लाह बख़्शने वाला, मेहरबान है [42]।"
यहाँ 'फ़ज़ीलत वाले' से मुराद सहाबा-ए-किराम में सबसे अफ़ज़ल हस्ती हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) हैं, जिनकी रूहानी बुज़ुर्गी और आला अख़लाक़ का यह वाज़ेह एतराफ़ है।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ अपने क़रीबी रिश्तेदार हज़रत मिस्तह बिन उसासा की माली मदद फ़रमाया करते थे जो ग़रीब मुहाजिर और बदरी सहाबी थे। जब मिस्तह सादा-लौही में इफ़्क की अफ़वाह में शरीक हो गए, तो हज़रत अबू बक्र ने रंजिदा होकर क़सम खाई कि आइंदा उनकी मदद नहीं करेंगे। अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाकर ऐसी क़समें खाने से मना फ़रमाया।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया: 'क्या तुम यह पसंद नहीं करते कि अल्लाह तुम्हें बख़्श दे?' यह सुनते ही हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रो पड़े और फ़रमाया: 'बेशक या अल्लाह! हम चाहते हैं कि तू हमें बख़्श दे', और उन्होंने मिस्तह का वज़ीफ़ा पहले से दोगुना कर दिया। यह आयत सिखाती है कि दूसरों को माफ़ करना अल्लाह की मग़फ़िरत हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रिया है।
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