Transliteration: (Laisa 'alaikum junaahun ann tadkhuloo buyootan ghaira maskoonatin feeha mataa'ul lakum; wallaahu ya'lamu maa tubdoona wa maa taktumoon)
"तुम पर इसमें कोई गुनाह नहीं कि तुम ऐसे मकानात में दाख़िल हो जाओ जो किसी की ख़ास रिहाइशगाह नहीं हैं [55] और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ है [56]; और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो छुपाते हो [57]।"
पब्लिक प्लेसेज़ जैसे सराय, होटल, दुकानें, मुसाफ़िरख़ाने या आम दफ़ातिर जो किसी ख़ास शख़्स का ज़ाती और रिहाइशी घर नहीं हैं, उनमें दाख़िले के लिए इजाज़त की शर्त नहीं है।
बशर्ते कि वहाँ जाने का कोई जायज़ सबब या मुआशरती ज़रूरत हो। शरीअत ने आसानी और ज़रूरत का पूरा लिहाज़ रखा है।
अल्लाह तआला तुम्हारे ज़ाहिर व बातिन और नीयतों से पूरी तरह बाख़बर है, इसलिए आम मक़ामात पर भी बदनीयती या ख़यानत से बचना लाज़िम है।
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