कुरान - 24:29 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
لَّيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَن تَدۡخُلُواْ بُيُوتًا غَيۡرَ مَسۡكُونَةٖ فِيهَا مَتَٰعٞ لَّكُمۡۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مَا تُبۡدُونَ وَمَا تَكۡتُمُونَ

Transliteration: (Laisa 'alaikum junaahun ann tadkhuloo buyootan ghaira maskoonatin feeha mataa'ul lakum; wallaahu ya'lamu maa tubdoona wa maa taktumoon)

तुम पर इसमें कोई गुनाह नहीं कि तुम ऐसे मकानात में (बिना इजाज़त) दाख़िल हो जाओ जो किसी की ख़ास रिहाइशगाह नहीं हैं [55] और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ है (इस्तेमाल का इख़्तियार है) [56]; और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपाते हो [57]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 29

"तुम पर इसमें कोई गुनाह नहीं कि तुम ऐसे मकानात में दाख़िल हो जाओ जो किसी की ख़ास रिहाइशगाह नहीं हैं [55] और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ है [56]; और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो छुपाते हो [57]।"

[55] आम रिहाइशगाहों से मुस्तस्ना मक़ामात

पब्लिक प्लेसेज़ जैसे सराय, होटल, दुकानें, मुसाफ़िरख़ाने या आम दफ़ातिर जो किसी ख़ास शख़्स का ज़ाती और रिहाइशी घर नहीं हैं, उनमें दाख़िले के लिए इजाज़त की शर्त नहीं है।

[56] जायज़ ग़रज़ और इस्तिफ़ादा

बशर्ते कि वहाँ जाने का कोई जायज़ सबब या मुआशरती ज़रूरत हो। शरीअत ने आसानी और ज़रूरत का पूरा लिहाज़ रखा है।

[57] नीयतों पर इलाही निगरानी

अल्लाह तआला तुम्हारे ज़ाहिर व बातिन और नीयतों से पूरी तरह बाख़बर है, इसलिए आम मक़ामात पर भी बदनीयती या ख़यानत से बचना लाज़िम है।

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