कुरान - 24:30 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
قُل لِّلۡمُؤۡمِنِينَ يَغُضُّواْ مِنۡ أَبۡصَٰرِهِمۡ وَيَحۡفَظُواْ فُرُوجَهُمۡۚ ذَٰلِكَ أَزۡكَىٰ لَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرُۢ بِمَا يَصۡنَعُونَ

Transliteration: (Qul lilmu' mineena yaghuuddoo min absaarihim wa yahfazoo furoojahum; zaalika azkaa lahum; innallaaha khabeerum bimaa yasna'oon)

(ऐ नबी!) आप मोमिन मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें [58] और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें [59]; यह उनके लिए ज़्यादा पाकीज़गी की बात है [60]; बेशक अल्लाह ख़ूब बाख़बर है उससे जो कुछ वे करते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 30

"मोमिन मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें [58] और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें [59]; यह उनके लिए ज़्यादा पाकीज़गी की बात है [60]; बेशक अल्लाह ख़ूब बाख़बर है।"

[58] गज़-ए-बसर (निगाहें नीची रखना)

मोमिन मर्दों को हुक्म हुआ कि ग़ैर-महरम औरतों और हराम चीज़ों को देखने से अपनी निगाहों की हिफ़ाज़त करें। पहली ग़ैर-इरादी नज़र मुआफ़ है मगर दोबारा घूरना या शहवत से देखना हराम है। नज़र शैतान के तीरों में से एक ज़हरीला तीर है।

[59] शर्मगाहों की हिफ़ाज़त

ज़िना, बदकारी और ग़ैर-शरई सोहबत से बचना और अपने सतर को ढांक कर रखना हर मोमिन पर लाज़िम है।

[60] पाकीज़ा क़ल्ब व अख़लाक़

निगाह की हिफ़ाज़त दिल को पाक रखती है और गुनाहों के ख़यालात से बचाती है। जो शख़्स अल्लाह के ख़ौफ़ से अपनी निगाह नीची रखता है, अल्लाह तआला उसके दिल में ईमान की मिठास अता फ़रमाता है।

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