Transliteration: (Wal yasta'fifil lazeena laa yajidoona nikaahan hatta yughniyahumul laahu min fadlih; wallazeena yabtaghoonal kitaaba mimmaa malakat aimaanukum fakaatiboohum in 'alimtum feehim khairanw wa aatoohum mimmaalil laahil lazeee aataakum; wa laa tukrihoo fatayaatikum 'alal bighaaa'i in aradna tahassunal litabtaghoo 'aradal hayaatid dunyaa; wa mai yukrihhunna fa innal laaha mim ba'di ikraahihinna Ghafoorur Raheem)
"और जिन्हें निकाह का साधन न मिले वे पाकदामनी रखें [80] यहाँ तक कि अल्लाह ग़नी कर दे [81]... मुकातबत लिख लो [82] अगर भलाई जानो [83], और उन्हें अल्लाह के माल में से दो [84]... बांदियों को बदकारी पर मजबूर न करो [85]; और जो मजबूर करेगा तो अल्लाह बख़्शने वाला है [86]।"
जो माली तंगी या अस्बाब की कमी की वजह से निकाह न कर सकें, वे सब्र और रोज़ों के ज़रिए अपने नफ़्स पर क़ाबू रखें और पाकदामन रहें जब तक कि अल्लाह उन्हें माली वुसअत अता न फ़रमाए।
अगर कोई ग़ुलाम या बांदी अपनी कमाई से क़ीमत अदा करके आज़ाद होना चाहे, तो मालिक को मुकातबत का मुआहिदा लिखने और अपनी ज़कात व सदक़ात से उसकी माली मदद करने का हुक्म दिया गया। यह इस्लाम का ग़ुलामी को ख़त्म करने का इंतिहाई मुअस्सिर क़ानून था।
ज़माना-ए-जाहिलियत में अब्दुल्लाह बिन उबई जैसे मुनाफ़िक़ अपनी बांदियों से जिस्मफ़रोशी कराकर पैसे कमाते थे। इस्लाम ने इसे क़तई हराम क़रार दिया और फ़रमाया कि मजबूर की गई बेबस औरतों पर कोई गुनाह नहीं, बल्कि गुनाह और अज़ाब उन ज़ालिम मालिकों पर है जो मजबूर करते हैं।
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