कुरान - 24:37 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
رِجَالٞ لَّا تُلۡهِيهِمۡ تِجَٰرَةٞ وَلَا بَيۡعٌ عَن ذِكۡرِ ٱللَّهِ وَإِقَامِ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءِ ٱلزَّكَوٰةِ يَخَافُونَ يَوۡمٗا تَتَقَلَّبُ فِيهِ ٱلۡقُلُوبُ وَٱلۡأَبۡصَٰرُ

Transliteration: (Rijaalul laa tulheehim tijaaratunw wa laa bai'un 'an zikril laahi wa iqaamis Salaati wa eetaaa'iz Zakaati yakhaafoona Yawman tataqallabu feehil quloobu wal absaar)

ऐसे मर्द जिन्हें न कोई ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त और न कोई तिजारत [100] अल्लाह के ज़िक्र से, और नमाज़ क़ायम करने से और ज़कात अदा करने से ग़ाफ़िल करती है [101]; वे उस दिन से डरते हैं [102] जिसमें दिल और आंखें (दहशत से) उलट-पुलट हो जाएंगी [103]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 37

"ऐसे मर्द जिन्हें न कोई तिजारत [100] अल्लाह के ज़िक्र से, नमाज़ क़ायम करने से और ज़कात अदा करने से ग़ाफ़िल करती है [101]; वे उस दिन से डरते हैं [102] जिसमें दिल और आंखें उलट-पुलट हो जाएंगी [103]।"

[100] तिजारत के बावजूद याद-ए-इलाही

यह उन कामिल मोमिनों (सहाबा-ए-किराम और सालेहीन) की सिफ़त है जो दुनियावी कारोबार और हलाल रिज़्क़ कमाने में मशग़ूल होने के बावजूद अल्लाह के ज़िक्र से एक लम्हे के लिए भी ग़ाफ़िल नहीं होते। अज़ान सुनते ही दुकान और कारोबार छोड़कर मस्जिद की तरफ़ दौड़ पड़ते हैं।

[101] इक़ामत-ए-सलात और अदायगी-ए-ज़कात

वे अपने वक़्त पर नमाज़ क़ायम करते हैं और अपने माल से ख़ुशदिली के साथ हक़दारों को ज़कात अदा करते हैं।

[102-103] क़ियामत की हौलनाकी का ख़ौफ़

वे उस ख़ौफ़नाक दिन से डरते हैं जब क़ियामत की शिद्दत और दहशत से दिल हलक़ में आ जाएंगे और आंखें पथरा कर उलट जाएंगी। यही ख़ौफ़-ए-ख़ुदा उनकी ज़िन्दगी को पाकीज़ा रखता है।

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