Transliteration: (Laa taj’aloo du’aaa’ar Rasooli bainakum ka du’aaa’i ba’dikum ba’daa; qad ya’lamul laahul lazeena yatasallaloona minkum liwaazaa; fal yahzaril lazeena yukhaalifoona ‘an amriheee ‘an tuseebahum fitnatun aw yuseebahum ‘azaabun aleem)
"रसूल के पुकारने को आपस में एक-दूसरे जैसा न बना लो [180]; अल्लाह जानता है जो आड़ लेकर खिसक जाते हैं [181]; पस डरें जो हुक्म की मुख़ालिफ़त करते हैं कि फ़ितना न आ पड़े [182] या दर्दनाक अज़ाब न आ जाए [183]!"
इस आयत के दो अज़ीम मानी हैं: (1) हुज़ूर ﷺ को आम लोगों की तरह नाम लेकर न पुकारो बल्कि इंतिहाई ताज़ीम व एहतिराम के साथ 'या रसूलल्लाह', 'या नबीयल्लाह' कहकर अर्ज़ करो; (2) हुज़ूर ﷺ जब किसी को पुकारें तो उसे आम दावत न समझो बल्कि फ़ौरन हर काम (हत्ता कि नमाज़) छोड़कर लब्बैक कहो। हुज़ूर ﷺ की ताज़ीम ईमान की अस्ल रूह है।
मुनाफ़िक़ मजलिस-ए-नबवी से किसी बहाने एक-दूसरे की आड़ लेकर चुपके से खिसक जाते थे, अल्लाह उनके इस निफ़ाक़ से ख़ूब बाख़बर है।
जो लोग रसूलुल्लाह ﷺ के हुक्म और सुन्नत की मुख़ालिफ़त करते हैं, उन्हें डरना चाहिए कि दुनिया में दिल की सख्ती, बदअक़ीदगी और फ़ित्नों में मुब्तला कर दिए जाएंगे या आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब में पकड़े जाएंगे। निजात सिर्फ़ और सिर्फ़ इताअत-ए-रसूल में है।
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