कुरान - 24:63 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

63
لَّا تَجۡعَلُواْ دُعَآءَ ٱلرَّسُولِ بَيۡنَكُمۡ كَدُعَآءِ بَعۡضِكُم بَعۡضٗاۚ قَدۡ يَعۡلَمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنكُمۡ لِوَاذٗاۚ فَلۡيَحۡذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنۡ أَمۡرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمۡ فِتۡنَةٌ أَوۡ يُصِيبَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ

Transliteration: (Laa taj’aloo du’aaa’ar Rasooli bainakum ka du’aaa’i ba’dikum ba’daa; qad ya’lamul laahul lazeena yatasallaloona minkum liwaazaa; fal yahzaril lazeena yukhaalifoona ‘an amriheee ‘an tuseebahum fitnatun aw yuseebahum ‘azaabun aleem)

तुम अपने दरमियान रसूल के पुकारने को ऐसा न बना लो जैसा तुम आपस में एक-दूसरे को पुकारते हो [180]; यक़ीनन अल्लाह तुम में से उन लोगों को ख़ूब जानता है जो एक-दूसरे की आड़ लेकर चुपके से खिसक जाते हैं [181]; पस उन लोगों को इस बात से डरना चाहिए जो उनके हुक्म की मुख़ालिफ़त करते हैं कि कहीं उन पर कोई फ़ितना न आ पड़े [182] या उन पर कोई दर्दनाक अज़ाब न नाज़िल हो जाए [183]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 63 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 63

"रसूल के पुकारने को आपस में एक-दूसरे जैसा न बना लो [180]; अल्लाह जानता है जो आड़ लेकर खिसक जाते हैं [181]; पस डरें जो हुक्म की मुख़ालिफ़त करते हैं कि फ़ितना न आ पड़े [182] या दर्दनाक अज़ाब न आ जाए [183]!"

[180] शान-ए-रिसालत और ताज़ीम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ का अदब

इस आयत के दो अज़ीम मानी हैं: (1) हुज़ूर ﷺ को आम लोगों की तरह नाम लेकर न पुकारो बल्कि इंतिहाई ताज़ीम व एहतिराम के साथ 'या रसूलल्लाह', 'या नबीयल्लाह' कहकर अर्ज़ करो; (2) हुज़ूर ﷺ जब किसी को पुकारें तो उसे आम दावत न समझो बल्कि फ़ौरन हर काम (हत्ता कि नमाज़) छोड़कर लब्बैक कहो। हुज़ूर ﷺ की ताज़ीम ईमान की अस्ल रूह है।

[181] मुनाफ़िक़ों की छुपकर भागने की हरकत

मुनाफ़िक़ मजलिस-ए-नबवी से किसी बहाने एक-दूसरे की आड़ लेकर चुपके से खिसक जाते थे, अल्लाह उनके इस निफ़ाक़ से ख़ूब बाख़बर है।

[182-183] हुक्म-ए-रसूल की मुख़ालिफ़त पर ख़ौफ़नाक वईद

जो लोग रसूलुल्लाह ﷺ के हुक्म और सुन्नत की मुख़ालिफ़त करते हैं, उन्हें डरना चाहिए कि दुनिया में दिल की सख्ती, बदअक़ीदगी और फ़ित्नों में मुब्तला कर दिए जाएंगे या आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब में पकड़े जाएंगे। निजात सिर्फ़ और सिर्फ़ इताअत-ए-रसूल में है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now