Transliteration: (Sanafrughu lakum ayyuhas saqalaan)
"अनक़रीब हम तुम्हारी तरफ़ मुतवज्जेह होते हैं ऐ दोनों भारी जमाअतो [28] (इंसान और जिन्न)!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'सक़लैन' से मुराद इंसान और जिन्न हैं क्योंकि ये दोनों ज़मीन पर बोझ और शरई ज़िम्मेदारियों के भारी मुकल्लफ़ हैं। यहाँ 'फ़ारिग़ होना/मुतवज्जेह होना' मुहावरे के तौर पर है, जिसका मक़सद यह है कि क़यामत के दिन अल्लाह तआला ख़ास तौर पर तुम्हारे आमाल का हिसाब लेने के लिए अदालत-ए-इंसाफ़ क़ायम फ़रमाएगा।
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