कुरान - 55:33 सूरह अर-रहमान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
يَٰمَعۡشَرَ ٱلۡجِنِّ وَٱلۡإِنسِ إِنِ ٱسۡتَطَعۡتُمۡ أَن تَنفُذُواْ مِنۡ أَقۡطَارِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ فَٱنفُذُواْۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلۡطَٰنٖ

Transliteration: (Yaa ma'sharal jinni wal insi inis tata'tum an tanfuzoo min aqtaaris samaawaati wal ardi fanfuzoo; laa tanfuzoona illaa bisultaan)

ऐ जिन्नात और इंसानों के गिरोह! अगर तुम आसमानों और ज़मीन के किनारों से निकल भाग सकते हो, तो निकल भागो [30]! जहाँ भी जाओगे, उसी की सल्तनत है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रहमान आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रहमान तफ़सीर - आयत 33

"ऐ जिन्नात और इंसानों के गिरोह! अगर तुम आसमानों और ज़मीन के किनारों से निकल भाग सकते हो, तो निकल भागो [30]! जहाँ भी जाओगे, उसी की सल्तनत है।"


[30] सल्तनत-ए-इलाही से बाहर निकल भागने से आजिज़

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि यह आयत काफ़िरों और नाफ़रमानों को खुला चैलेंज है कि अगर तुम अल्लाह के मुहासिबे और अज़ाब से बचना चाहते हो तो उसकी कायनात की हदों से बाहर निकलकर दिखाओ! मगर कोई मख़लूक़ अल्लाह की कुव्वत व सुल्तान के बग़ैर कहीं नहीं जा सकती, और पूरी कायनात रब्बुल आलमीन की मुकम्मल मिलकियत है।

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