Transliteration: (Maaa antum 'alaihi bi faaatineen)
"तुम किसी को उसके ख़िलाफ़ बहका नहीं सकते [162],"
इस आयत का मफ़हूम यह है कि न तो तुम्हारी कोशिशें और न तुम्हारे बुत किसी को अल्लाह के सीधे रास्ते से भटका सकते हैं, सिवाए उस शख़्स के जिसके दिल में पहले ही से कुफ़्र और सरकशी मौजूद हो।
इसकी मिसाल यूँ है कि आग के लिए तेल की हाजत होती है; वही दीया या चिराग़ जल सकता है जिसमें तेल और बाती हो। इसी तरह जिस दिल में कुफ़्र व ग़फ़लत की ज़ुल्मत और ख़बासत होगी, वही शैतानी बहकावे में आएगा।
जिनके दिलों में ईमान की रौशनी और पाकीज़गी है, उन्हें कोई ताक़त गुमराह नहीं कर सकती, चाहे ज़ाहिरी तौर पर कितने ही फ़ितने सामने आएं।
मिसाल के तौर पर, अबू जहल हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की मुक़द्दस सोहबत और क़ुरबत के बावजूद अपने दिल की ख़बासत और महरूमी की वजह से ईमान न ला सका।
इससे मालूम हुआ कि हिदायत अल्लाह तआला की अता है, और गुमराही उसी के हिस्से में आती है जो अपनी बद-बख़्ती से बातिल को अपनाता है।
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