Transliteration: (Lakunna 'ibaadal laahil mukhlaseen)
"तो हम ज़रूर अल्लाह के चुने हुए [167] (मुख़लिस) बंदे होते।"
यह आयत काफ़िरों के उस झूठे दावे को बयान करती है जिसमें वे कहते थे कि अगर हमारे पास कोई आसमानी किताब नाज़िल होती, तो हम यहूद व नसारा की तरह नाफ़रमानी न करते बल्कि अल्लाह के सबसे मुख़लिस और फ़रमांबरदार बंदे बन कर दिखाते।
लेकिन जब हक़ीक़त में हुज़ूर सय्यिदे आलम ﷺ और अफ़ज़ल तरीन किताब क़ुरआन मजीद उनके पास तशरीफ़ लाए, तो उन्होंने हसद, तकब्बुर और हठधर्मी में आकर उसका साफ़ इन्कार कर दिया और उनके दावे खोखले साबित हुए।
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