Transliteration: (Wa qaalooo 'a-izaa dalalnaa fil ardi 'a-innaa lafee khalqin jadeed; bal hum biliqaaa'i rabbihim kaafiroon)
"और उन्होंने कहा, 'क्या जब हम ज़मीन में (गल-सड़ कर) गुम हो जाएंगे, तो क्या हम फिर नए सिरे से पैदा किए जाएंगे?' बल्कि वे अपने रब की मुलाक़ात ही के मुनकिर हैं [20]।"
काफ़िरों का यह सवाल हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की ख़िदमत में ईमान लाने की नीयत से नहीं था, बल्कि महज़ हठधर्मी, इंकार और मज़ाक़ उड़ाने के तौर पर था।
उनकी अस्ल बीमारी दोबारा ज़िंदा किए जाने की ना-समझी नहीं, बल्कि अपने रब के हुज़ूर हाज़िरी और मुलाक़ात का इंकार थी, जो उनके तकब्बुर और कुफ़्र को ज़ाहिर करता है, न कि किसी सच्चे शुबहे को।
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