कुरान - 32:9 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

9
ثُمَّ سَوَّىٰهُ وَنَفَخَ فِيهِ مِن رُّوحِهِۦۖ وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَٱلۡأَفۡـِٔدَةَۚ قَلِيلٗا مَّا تَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Thumma sawwaahu wa nafakha feehi mir roohihih; wa ja'ala lakumus sam'a wal-absaara wal-af'idah; qaleelam maa tashkuroon)

फिर उसे ठीक-ठाक (मुकम्मल) किया और उसमें अपनी रूह फूंकी [18], और तुम्हारे लिए कान, आँखें और दिल बनाए [19]; तुम बहुत ही कम शुक्र अदा करते हो! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 9 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 9

"फिर उसे ठीक-ठाक (मुकम्मल) किया और उसमें अपनी रूह फूंकी [18], और तुम्हारे लिए कान, आँखें और दिल बनाए [19]; तुम बहुत ही कम शुक्र अदा करते हो!"

[18] नफ़ख़-ए-रूह और इलाही निस्बत

इसका मतलब यह है कि जब माँ के पेट में बच्चे के तमाम आज़ा मुकम्मल हो गए, तो अल्लाह तआला ने उसमें रूह फूँक दी।
इससे यह सबक़ मिलता है कि अल्लाह के प्यारे बंदों के आमाल—जैसे फ़रिश्ते का बच्चे की सूरत बनाना और रूह फूँकना—को अल्लाह अपनी तरफ़ मंसूब फ़रमाता है, जो साबित करता है कि मक़बूल बंदों के काम हक़ीक़त में अल्लाह ही के काम होते हैं।

[19] इंसानी क़ुव्वतों की बुजु़र्गी

अगरचे आँखें, कान और दिल जानवरों को भी अता किए गए हैं, लेकिन इंसानों में इन सलाहियतों को एक ख़ास शर्फ़ हासिल है।
इन्हीं के ज़रिए इंसान इलाही आयात और निशानियों को पहचानता है, और इंसान का दिल इलाही मारिफ़त और नूर की आरामगाह बनता है।
यह रूहानी सिफ़त इंसान को अशरफ़ुल मख़्लूक़ात बनाती है, इसलिए आयत में ख़ास तौर पर इन आज़ा का ज़िक्र फ़रमाया गया।

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