Transliteration: (Fa a'rid 'anhum wantazir innahum muntaziroon (section 3))
"पस आप उनसे मुंह फेर लीजिए [58] और इंतज़ार कीजिए; बेशक वे भी इंतज़ार करने वाले हैं।"
यह आयत हुज़ूर ﷺ को हुक्म देती है कि मज़ाक़ उड़ाने वाले काफ़िरों से किनारा-कशी इख़्तियार फ़रमाएं और अल्लाह के फ़ैसले का सब्र के साथ इंतज़ार करें।
अगर इससे मुराद यह ली जाए कि "उनसे जंग न करें", तो यह हुक्म बाद में नाज़िल होने वाली जिहाद की आयात से मंसूख़ (अब्रोगेट) हो गया जिन्होंने डिफ़ेंसिव और ऑफ़ेंसिव जंग का हुक्म दिया।
लेकिन अगर इसका मफ़हूम यह हो कि "उनसे दोस्ताना और दिली तअल्लुक़ न रखें", तो यह हुक्म क़यामत तक मुस्तहकम और बरक़रार है।
आज भी यह आयत मोमिनीन को सिखाती है कि काफ़िरों के मज़ाक़ और बे-हुदा बातों का जवाब वैसी ही बे-हुदगी से न दिया जाए। बल्कि अपनी वक़ार और सब्र को बरक़रार रखें, और यक़ीन रखें कि अल्लाह सही वक़्त पर फ़ैसला फ़रमाएगा और हक़ को ग़ालिब करेगा।
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