कुरान - 32:26 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
أَوَلَمۡ يَهۡدِ لَهُمۡ كَمۡ أَهۡلَكۡنَا مِن قَبۡلِهِم مِّنَ ٱلۡقُرُونِ يَمۡشُونَ فِي مَسَٰكِنِهِمۡۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٍۚ أَفَلَا يَسۡمَعُونَ

Transliteration: (Awalam yahdi lahum kam ahlaknaa min qablihim minal qurooni yamshoona fee masaakinihim; inna fee zaalika la aayaatin afalaa yasma'oon)

क्या उन्हें इस बात से भी हिदायत न मिली कि हमने उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हलाक कर दिया जिनके रहने की जगहों में आज ये चलते-फिरते हैं? बेशक इसमें बड़ी निशानियाँ हैं; तो क्या वे सुनते नहीं [52]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 26

"क्या उन्हें इस बात से भी हिदायत न मिली कि हमने उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हलाक कर दिया जिनके रहने की जगहों में आज ये चलते-फिरते हैं? बेशक इसमें बड़ी निशानियाँ हैं; तो क्या वे सुनते नहीं [52]?"

[52] गुज़री हुई क़ौमों के खंडरत से इबरत

कुफ़्फ़ार-ए-मक्का अपने तिजारती असफ़ार के दौरान उन पुरानी क़ौमों के खंडरात और वीरान मकानात से गुज़रते थे जो अपनी नाफ़रमानियों की वजह से हलाक कर दी गई थीं।

उन्हें तारीख़ी मालूमात हासिल थीं—या तो ख़ुद अपने मुशाहदे से या अहले इल्म के ज़रिए—कि इन इलाक़ों में कभी ऐसी क़ौमें आबाद थीं, और उन पर इलाही अज़ाब उनके अंबिया को झुठलाने और अल्लाह की नाफ़रमानी की वजह से नाज़िल हुआ था।

यह आयत उन्हें उन खंडरात पर ग़ौर करने की दावत देती है, क्योंकि वे इलाही चेतावनी की खुली निशानियाँ हैं। मगर वे फिर भी ग़फ़लत में डूबे रहे।

इससे हमें मालूम होता है कि:

  • हलाक-शुदा क़ौमों के खंडरात को इबरत व नसीहत हासिल करने की नीयत से देखना पसंदीदा अमल है।

  • इसी तरह अल्लाह के नेक बंदों के मज़ारात की ज़ियारत करना और उनकी पाकीज़ा ज़िंदगी पर ग़ौर करना भी ईमान को ताज़गी देता है और रूहानी बसीरत का सबब बनता है।

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