कुरान - 32:27 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّا نَسُوقُ ٱلۡمَآءَ إِلَى ٱلۡأَرۡضِ ٱلۡجُرُزِ فَنُخۡرِجُ بِهِۦ زَرۡعٗا تَأۡكُلُ مِنۡهُ أَنۡعَٰمُهُمۡ وَأَنفُسُهُمۡۚ أَفَلَا يُبۡصِرُونَ

Transliteration: (Awalam yaraw annaa nasooqul maaa'a ilal ardil juruzi fanukhriju bihee zar'an ta'kulu minhu an'aamuhum wa anfusuhum afalaa yubsiroon)

क्या उन्होंने नहीं देखा कि हम पानी को सूखी बंजर ज़मीन की तरफ़ बहा ले जाते हैं फिर उसके ज़रिये खेती निकालते हैं [53], जिसमें से उनके जानवर भी खाते हैं और वे ख़ुद भी [54]? तो क्या वे देखते नहीं? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 27

"क्या उन्होंने नहीं देखा कि हम पानी को सूखी बंजर ज़मीन की तरफ़ बहा ले जाते हैं फिर उसके ज़रिये खेती निकालते हैं [53], जिसमें से उनके जानवर भी खाते हैं और वे ख़ुद भी [54]? तो क्या वे देखते नहीं?"

[53] दोबारा ज़िंदा होने (हश्र) की निशानी

यह आयत बारिश के ज़रिए मुर्दा ज़मीन को ज़िंदा करने की तरफ़ तवज्जोह दिलाती है, जो मौत के बाद दोबारा ज़िंदा होने की साफ़ मिसाल है।
जिस तरह अल्लाह मुर्दा ज़मीन में जान डाल देता है, उसी तरह वह क़ब्रों से मुर्दों को दोबारा ज़िंदा फ़रमाएगा।
क़ुदरत के इस मंज़र पर ग़ौर करना इंसान के दिल में क़यामत और हश्र के अक़ीदे को पुख़्ता करता है।

[54] इंसान और चौपायों दोनों के लिए रिज़्क़

एक ही मिट्टी से अल्लाह तआला तरह-तरह की फ़सलें उगाता है:

  • जिनमें से कुछ हिस्से इंसान खाते हैं, जैसे फल, अनाज और सब्ज़ियाँ,

  • और दूसरे हिस्से, जैसे चारा, भूसा और तिनके, जानवर (चौपाए) खाते हैं।

यह अल्लाह के बनाए हुए कामिल और मुतवाज़िन निज़ाम को ज़ाहिर करता है—जो तमाम मख़्लूक़ात की परवरिश फ़रमाता है—और उसकी अज़ीम क़ुदरत व हिकमत का मुज़ाहरा करता है।

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