कुरान - 32:24 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
وَجَعَلۡنَا مِنۡهُمۡ أَئِمَّةٗ يَهۡدُونَ بِأَمۡرِنَا لَمَّا صَبَرُواْۖ وَكَانُواْ بِـَٔايَٰتِنَا يُوقِنُونَ

Transliteration: (Wa ja'alnaa minhum a'immatany yahdoona bi amrinaa lammaa sabaroo wa kaanoo bi aayaatinaa yooqinoon)

और हमने उनमें से पेशवा (इमाम) बनाए [49] जो हमारे हुक्म से (लोगों को) हिदायत करते थे, जब उन्होंने सब्र किया; और वे हमारी आयात पर कामिल यक़ीन रखते थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 24

"और हमने उनमें से पेशवा (इमाम) बनाए [49] जो हमारे हुक्म से (लोगों को) हिदायत करते थे, जब उन्होंने सब्र किया; और वे हमारी आयात पर कामिल यक़ीन रखते थे।"

[49] दीनी पेशवाओं (इमामों) का तअय्युन

इससे मुराद बनी इसराईल के औलिया-ए-किराम और सालेहीन हैं, जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की हयात-ए-ज़ाहिरी में और आपके बाद तशरीफ़ लाए।
इन मुक़द्दस हस्तियों को लोगों की रहनुमाई करने और हक़ के रास्ते को क़ायम रखने के लिए चुना गया था।

[50] आयत से हासिल होने वाले अहम उसूल

इस आयत-ए-मुबारका से चंद बुनियादी उसूल मालूम होते हैं:

  1. दीनी उलेमा और औलिया-ए-किराम दीन के पेशवा (इमाम) क़रार पाते हैं।

  2. जिस तरह अल्लाह का क़ुर्ब पाने के लिए अंबिया का वसीला लाज़िम है, उसी तरह इमाम और मुर्शिद रसूल तक पहुँचाने वाले रहनुमा बनते हैं।

  3. दीन की इमामत और सरदारी ईमान, तक़वा और सब्र के मजमूए से हासिल होती है।

  4. इमामों की कोई मख़्सूस तादाद मुक़र्रर नहीं है; वे बारह, छह, तीन या उससे ज़्यादा भी हो सकते हैं।
    जो शख़्स भी सच्चे ईमान, तक़वा और सब्र-ओ-इस्तिक़ामत का पैकर हो, वह अल्लाह के नज़दीक दीनी पेशवा का मक़ाम पाता है।

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