Transliteration: (Wa laqad aatainaa Moosal Kitaaba falaa takun fee miryatim mil liqaaa'ihee wa ja'alnaahu hudal li Baneee Israaa'eel)
"और बेशक हमने मूसा को किताब (तौरात) अता फ़रमाई [46], पस आप उनकी मुलाक़ात के बारे में किसी शक में न रहें [47]; और हमने उसे बनी इसराईल के लिए हिदायत बनाया था [48]।"
इससे मुराद तौरात शरीफ़ है, जो दुनिया में नाज़िल होने वाली पहली मुकम्मल आसमानी किताब थी और हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को अता की गई।
आपसे पहले अंबिया-ए-किराम को सहाइफ़ (छोटे सहीफ़े) अता किए गए थे।
पस मुकम्मल आसमानी किताब पाने वाले पहले नबी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) हैं।
इसका मफ़हूम यह है: आप हरगिज़ शक न फ़रमाएं कि अल्लाह तआला ने मूसा (अलैहिस्सलाम) से कलाम फ़रमाया, क्योंकि यह कोई ख़्वाब नहीं बल्कि हक़ीक़ी मुकालमा था।
इससे उलेमा साबित करते हैं कि अल्लाह के नेक बंदे वफ़ात के बाद भी ज़िंदों से मुलाक़ात कर सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं, और उनकी पुकार सुन व जवाब दे सकते हैं।
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने शब-ए-मेअराज हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से मुलाक़ात फ़रमाई, और हज़रत मूसा के मशवरे ही से पचास नमाज़ें कम होकर पाँच रह गईं।
यह वाक़िआ साबित करता है कि दुनिया से पर्दा फ़रमाने के बाद भी अल्लाह के मक़बूल बंदे हुक्म-ए-इलाही से ज़िंदों की मदद फ़रमाते हैं।
यह हिदायत या तो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की ज़ात-ए-मुबारका की तरफ़ मंसूब है या तौरात शरीफ़ की तरफ़।
यह ज़ाहिर करता है कि हज़रत मूसा एक ख़ास ज़माने में ख़ास तौर पर बनी इसराईल के नबी थे, बरअक्स हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के जिन्हें तमाम इंसानियत के लिए रसूल बनाकर भेजा गया है।
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