Transliteration: (Wa lanuzeeqan nahum minal 'azaabil adnaa doonal 'azaabil akbari la'allahum yarji'oon)
"और हम ज़रूर उन्हें बड़े अज़ाब से पहले छोटे अज़ाब का मज़ा चखाएंगे [43], ताकि देखने वाला उम्मीद रखे कि शायद वे अब भी (तौबा करके) लौट आएं [44]!"
यह आयत लतीफ़ तौर पर अज़ाब-ए-क़ब्र की तरफ़ इशारा करती है, जो जहन्नुम के अज़ाब से हल्का है और उससे पहले पेश आता है।
कहा गया है कि क़ब्र में जहन्नुम की आग जैसी तपिश और धुआं पहुँचाया जाता है, लेकिन इंसान ख़ुद जहन्नुम में दाख़िल नहीं होता।
क़यामत के दिन के बाद का अज़ाब ज़्यादा सख़्त और बराह-ए-रास्त होगा।
काफ़िर पर क़ब्र में क़यामत तक मुसल्सल अज़ाब जारी रहेगा।
ताहम मोमिन को अगर क़ब्र में कोई तकलीफ़ पहुंचेगी तो वह आरज़ी होगी, और ज़िंदों की दुआओं, ईसाल-ए-सवाब और सदक़ात के ज़रिए वह तकलीफ़ दूर हो सकती है।
बाज़ मुफ़स्सिरीन ने “छोटे अज़ाब” से दुनियावी मुसीबतों—जैसे क़हत, जंग, शिकस्त और बीमारियाँ—मुराद ली हैं, ख़ास तौर पर कुफ़्फ़ार-ए-मक्का के हक़ में जिन्हें इन बलाओं में मुब्तला किया गया।
इस कम अज़ाब की हिकमत काफ़िरों को चेतावनी देना है ताकि वे अपने कुफ़्र से बाज़ आ जाएं।
इन निशानियों और तंबीहात को देखकर वे शायद ईमान क़बूल कर लें और सच्ची तौबा करें, और इस तरह आख़िरत के बड़े अज़ाब से महफ़ूज़ हो जाएं।
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