Transliteration: (Wa ammal lazeena fasaqoo fama'waahumun Naaru kullamaaa araadooo any yakhrujoo minhaaa u'eedoo feehaa wa qeela lahum zooqoo 'azaaaban Naaril lazee kuntum bihee tukazziboon)
"और जिन लोगों ने नाफ़रमानी (फ़िसक़) की [40], तो उनका ठिकाना आग है; जब कभी वे उसमें से निकलना चाहेंगे तो उसी में वापस धकेल दिए जाएंगे [41], और उनसे कहा जाएगा, 'चखो आग के उस अज़ाब का मज़ा जिसे तुम झुठलाया करते थे [42]!'"
लफ़्ज़ “फ़ुसूक़” (नाफ़रमानी) का अस्ल मफ़हूम हद से तजावुज़ करना है:
एक गुनहगार मोमिन के लिए इसका मतलब तक़वे की हद से निकलना है।
एक काफ़िर के लिए इसका मतलब ईमान की हद से बाहर होना है।
लेकिन इसकी सबसे बदतरीन सूरत हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की शान में गुस्ताख़ी करना है, जो इंसानियत की हद से भी गिर जाना है।
इस आयत में “फ़ासिक़ून” से मुराद ख़ास तौर पर काफ़िर हैं, गुनहगार मोमिन नहीं।
जहन्नुम में काफ़िर सख़्त तकलीफ़ और अज़ाब से तड़पकर उछलेंगे, और उनके जिस्म जहन्नुम के किनारे (मुहाने) तक आ पहुंचेंगे ताकि उसकी आग और अज़ाब से बच निकलें।
उस वक़्त फ़रिश्ते लोहे के भारी गुर्ज़ों से उन्हें मारेंगे, और बे-बस करके दोबारा आग की गहराइयों में धकेल देंगे।
इसका मतलब यह नहीं कि वे बा-क़ायदा भागने की ताक़त रखते हैं, बल्कि अज़ाब की शिद्दत और बे-क़रारी की वजह से ऊपर उठेंगे और फिर वापस पटक दिए जाएंगे।
अल्लाह का यह फ़रमान—“अज़ाब का मज़ा चखो”—हक़ को झुठलाने की दायमी सज़ा का इज़हार है।
वे आज उसी हक़ीक़त को अपनी आँखों से भुगत रहे हैं जिसका वे दुनिया में मज़ाक़ उड़ाते और इंकार करते थे।
यह आयत वाज़ेह करती है कि यह हमेशा का अज़ाब सिर्फ़ काफ़िरों के लिए है, गुनहगार मोमिनों के लिए नहीं, अगर अल्लाह चाहे।
मोमिन चाहे गुनहगार ही क्यों न हो, जहन्नुम में हमेशा नहीं रहेगा, क्योंकि उसने कभी हक़ को झुठलाया नहीं था।
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