कुरान - 32:22 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِۦ ثُمَّ أَعۡرَضَ عَنۡهَآۚ إِنَّا مِنَ ٱلۡمُجۡرِمِينَ مُنتَقِمُونَ

Transliteration: (Wa man azlamu mimman zukkira bi aayaati rabbihee summa a'rada 'anhaa; innaa minal mujrimeena muntaqimoon (section 2))

और उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जिसे उसके रब की आयात के ज़रिये नसीहत की जाए फिर वह उनसे मुंह फेर ले [45]? बेशक हम मुजरिमों से बदला लेने वाले हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 22

"और उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जिसे उसके रब की आयात के ज़रिये नसीहत की जाए फिर वह उनसे मुंह फेर ले [45]? बेशक हम मुजरिमों से बदला लेने वाले हैं।"

[45] इलाही आयात से एअराज़ (मुंह मोड़ना)

यह उन लोगों की मज़म्मत है जो अल्लाह की आयात से नसीहत हासिल करने के बाद मुंह मोड़ लेते हैं—यानी वे न तो क़ुरआनी आयात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं और न ही ईमान लाते हैं।

इलाही हिदायत से ऐसी जानबूझकर की गई लापरवाही और एअराज़ को सबसे बड़ा ज़ुल्म क़रार दिया गया है, क्योंकि उनके सामने हक़ पूरी तरह वाज़ेह हो चुका था और फिर भी उन्होंने जानते-बूझते उसे ठुकरा दिया।

लिहाज़ा ऐसे मुजरिमों के लिए सख़्त अज़ाब का वादा है, जो न सिर्फ़ हिदायत को नज़रअंदाज़ करते हैं बल्कि कुफ़्र पर अड़े रहते हैं।

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