Transliteration: (Afaman kaana mu'minan kaman kaana faasiqaa; laa yasta woon)
"भला क्या वह शख़्स जो मोमिन है उस शख़्स जैसा हो सकता है जो नाफ़रमान (फ़ासिक़) है? वे हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते [39]!"
यह आयत हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शान और बरीअत में नाज़िल हुई।
वलीद बिन उक़्बा बिन अबी मुईत ने एक बार तकब्बुर से आपसे कहा था: “मैं तुमसे ज़्यादा ताक़तवर, ज़्यादा मालदार और उम्र में बड़ा हूँ—तुम तो महज़ एक बे-सर-ओ-सामाँ नौजवान हो।”
हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने जवाब दिया कि माल, उम्र या जिस्मानी ताक़त फ़ख़्र की बुनियाद नहीं हैं।
आपने फ़रमाया: “तुम एक काफ़िर और फ़ासिक़ हो, जबकि हक़ीक़ी बुजु़र्गी ईमान और तक़वे में है, न कि दुनियावी ठाठ-बाट में।”
मोमिन और काफ़िर, और नेकोकार और बदकार के इस अज़ीम फ़र्क़ की तस्दीक़ इस आयत-ए-करीमा ने फ़रमाई (जैसा कि ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में मज़कूर है)।
इससे हम यह भी समझते हैं कि जो शख़्स यह गुमान करे कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ आम इंसानों जैसे हैं, वह ख़ुद गुमराह और बे-दीन है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"दोज़ख़ वाले और जन्नत वाले बराबर नहीं हैं" (सूरह अल-हश्र, आयत 20)।
यहाँ लफ़्ज़ “फ़ासिक़” (नाफ़रमान) से मुराद काफ़िर है, लेकिन दूसरी आयात में यह गुनहगार मोमिन के लिए भी आता है।
जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया:
"ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो अच्छी तरह तहक़ीक़ कर लिया करो..." (सूरह अल-हुजुरात, आयत 6),
जो साबित करता है कि लफ़्ज़ फ़ासिक़ दोनों मुक़ामात पर इस्तेमाल होता है—काफ़िर के लिए भी और गुनहगार मोमिन के लिए भी।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat