कुरान - 32:18 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
أَفَمَن كَانَ مُؤۡمِنٗا كَمَن كَانَ فَاسِقٗاۚ لَّا يَسۡتَوُۥنَ

Transliteration: (Afaman kaana mu'minan kaman kaana faasiqaa; laa yasta woon)

भला क्या वह शख़्स जो मोमिन है उस शख़्स जैसा हो सकता है जो नाफ़रमान (फ़ासिक़) है? वे हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते [39]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 18

"भला क्या वह शख़्स जो मोमिन है उस शख़्स जैसा हो सकता है जो नाफ़रमान (फ़ासिक़) है? वे हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते [39]!"

[39] शाने नुज़ूल और मोमिन व फ़ासिक़ का फ़र्क़

यह आयत हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शान और बरीअत में नाज़िल हुई।
वलीद बिन उक़्बा बिन अबी मुईत ने एक बार तकब्बुर से आपसे कहा था: “मैं तुमसे ज़्यादा ताक़तवर, ज़्यादा मालदार और उम्र में बड़ा हूँ—तुम तो महज़ एक बे-सर-ओ-सामाँ नौजवान हो।”
हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने जवाब दिया कि माल, उम्र या जिस्मानी ताक़त फ़ख़्र की बुनियाद नहीं हैं।
आपने फ़रमाया: “तुम एक काफ़िर और फ़ासिक़ हो, जबकि हक़ीक़ी बुजु़र्गी ईमान और तक़वे में है, न कि दुनियावी ठाठ-बाट में।”

मोमिन और काफ़िर, और नेकोकार और बदकार के इस अज़ीम फ़र्क़ की तस्दीक़ इस आयत-ए-करीमा ने फ़रमाई (जैसा कि ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में मज़कूर है)।

इससे हम यह भी समझते हैं कि जो शख़्स यह गुमान करे कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ आम इंसानों जैसे हैं, वह ख़ुद गुमराह और बे-दीन है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"दोज़ख़ वाले और जन्नत वाले बराबर नहीं हैं" (सूरह अल-हश्र, आयत 20)।

यहाँ लफ़्ज़ “फ़ासिक़” (नाफ़रमान) से मुराद काफ़िर है, लेकिन दूसरी आयात में यह गुनहगार मोमिन के लिए भी आता है।
जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया:
"ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो अच्छी तरह तहक़ीक़ कर लिया करो..." (सूरह अल-हुजुरात, आयत 6),
जो साबित करता है कि लफ़्ज़ फ़ासिक़ दोनों मुक़ामात पर इस्तेमाल होता है—काफ़िर के लिए भी और गुनहगार मोमिन के लिए भी।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now