Transliteration: (Falaa ta'lamu nafsum maaa ukhfiya lahum min qurrati a'yunin jazaaa'am bimaa kaanoo ya'maloon)
"तो किसी जान को ख़बर नहीं [37] कि उनके लिए उनकी आँखों की क्या ठंडक छुपा कर रखी गई है, उनके उन आमाल के बदले जो वे किया करते थे [38]!"
यह आयत आम मोमिनीन के हक़ में है, जिसमें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ शामिल नहीं हैं, क्योंकि आपको शब-ए-मेअराज पूरी जन्नत का मुशाहदा करा दिया गया था।
फ़रमाया “किसी जान को ख़बर नहीं” यानी जन्नत की नेअमतों का मुकम्मल और तफ़सीली इल्म लोगों से पोशीदा रखा गया है, अगरचे हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के सदक़े हमें वही-ए-इलाही के ज़रिए उनका इजमाली और मुख़्तसर इल्म हासिल हुआ है।
पस यह आयत हुज़ूर ﷺ के इल्म की नफ़ी नहीं करती, और न ही यह मोमिनीन के ईमान के ख़िलाफ़ है, जो नाज़िल-शुदा ग़ैब की तस्दीक़ करते हैं चाहे उसकी पूरी तफ़सील सामने न हो।
यह हिस्सा ख़ास तौर पर उस जन्नत की तरफ़ इशारा करता है जो नेक आमाल की जज़ा के तौर पर अता होगी।
ताहम यह दूसरों को महरूम नहीं करता, जैसे:
मोमिनीन के ना-बालिग़ बच्चे जो बचपन ही में विसाल पा गए,
वे लोग जिन्हें आमाल करने की मुद्दत या मौक़ा न मिल सका (मसलन ईमान लाते ही शहीद हो गए), या
वे गुनहगार मोमिन जो शफ़ाअत और मग़फ़िरत के ज़रिए बिला-आख़िर जन्नत में दाख़िल किए जाएंगे।
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