कुरान - 32:16 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمۡ عَنِ ٱلۡمَضَاجِعِ يَدۡعُونَ رَبَّهُمۡ خَوۡفٗا وَطَمَعٗا وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ

Transliteration: (Tatajaafaa junoobuhum 'anil madaaji'i yad'oona rabbahum khawfanw wa tama'anw wa mimmaa razaqnaahum yunfiqoon)

उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते हैं (वे आराम नहीं करते) [34] और वे अपने रब को ख़ौफ़ और उम्मीद के साथ पुकारते हैं [35], और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ अता फ़रमाया है उसमें से (अल्लाह की राह में) ख़र्च करते हैं [36]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 16

"उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते हैं (वे आराम नहीं करते) [34] और वे अपने रब को ख़ौफ़ और उम्मीद के साथ पुकारते हैं [35], और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ अता फ़रमाया है उसमें से (अल्लाह की राह में) ख़र्च करते हैं [36]!"

[34] रात की इबादत (तहज्जुद) की फ़ज़ीलत

इससे मुराद वे नेक बंदे हैं जो रात के पिछले हिस्से में, जब दूसरे लोग सो रहे होते हैं, अपने बिस्तरों से उठ खड़े होते हैं ताकि नमाज़ पढ़ें और अपने रब के हुज़ूर रोएं-गिड़गिड़ाएं।
उनके बिस्तर ख़ाली रहते हैं क्योंकि वे मुसल्ले पर इबादत में खड़े होते हैं।

यहाँ दो अहम नुकात की तरफ़ इशारा है:

  1. नमाज़-ए-तहज्जुद सोकर उठने के बाद अदा की जानी चाहिए।

  2. नमाज़ बिस्तर पर नहीं, बल्कि घर में एक मख़्सूस मक़ाम-ए-इबादत या मुसल्ले (जा-नमाज़) पर अदा करनी चाहिए।

[35] ख़ौफ़ और उम्मीद के साथ मुख़्लिसाना दुआएं

इस हिस्से से चार अज़ीम हिदायात हासिल होती हैं:

  1. नमाज़-ए-तहज्जुद एक निहायत अफ़ज़ल इबादत है।

  2. इस वक़्त मांगी जाने वाली दुआएं बारगाह-ए-इलाही में मक़बूलियत का ज़्यादा इमकान रखती हैं।

  3. दुआ हमेशा क़बूलियत की उम्मीद और रद्द होने के ख़ौफ़ के साथ मांगनी चाहिए, ताहम उम्मीद का पहलू ग़ालिब रहना चाहिए।

  4. इबादत हर क़िस्म के दिखावे और रियाकारी से पाक होनी चाहिए, और ख़ालिस रज़ा-ए-इलाही के लिए की जाए। और हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की रज़ा ही अल्लाह तआला की रज़ा है, जैसा कि इरशाद फ़रमाया:
    "और अल्लाह और उसके रसूल का ज़्यादा हक़ था कि वे उन्हें राज़ी करते अगर वे ईमानदार थे" (सूरह अल-हश्र/अत-तौबा, आयत 62)।

[36] रिज़्क़-ए-इलाही से सदक़ा व ख़ैरात

इस जुमले से चंद बुनियादी क़वानीन सादिर होते हैं:

  1. सदक़ा ख़ालिस हलाल माल से होना चाहिए।

  2. इंसान को अपना तमाम माल ख़र्च नहीं कर देना चाहिए—बल्कि कुछ हिस्सा अपनी और अहल-ओ-अयाल की ज़रूरतों के लिए रखना लाज़िम है।

  3. ख़ैरात मुसल्सल और पाबंदी से होनी चाहिए, न कि महज़ एक बार।

ये तमाम अहकाम हर्फ़-ए-जर "मिन्" (में से), इस्म-ए-मौसूल "मा" (जो कुछ), और फे़ल "युनफ़िक़ून" (ख़र्च करते हैं) के सेग़ा-ए-मुज़ारेअ (हाल व इस्तिमरार) से अख़्ज़ किए गए हैं, और रिज़्क़ की निस्बत अल्लाह तआला की तरफ़ की गई है।

सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं कि सदक़ा सिर्फ़ माल ही से नहीं बल्कि इल्म, हुनर, सलाहियत और अख़लाक़ से भी देना चाहिए, क्योंकि “जो कुछ” का लफ़्ज़ हर क़िस्म की भलाई को शामिल है।

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