Transliteration: (Fazooqoo bimaa naseetum liqaaa'a yawmikum haaza innaa naseenaakum wa zooqoo 'azaabal khuldi bimaa kuntum ta'maloon)
"पस (अज़ाब का) मज़ा चखो इस वजह से कि तुमने अपने इस दिन की मुलाक़ात को भुला दिया था [29]; आज हमने भी तुम्हें छोड़ दिया (भुला दिया), और हमेशा के अज़ाब का मज़ा चखो उन आमाल के बदले जो तुम किया करते थे [30]।"
काफ़िरों से फ़रमाया जाएगा कि जहन्नुम का मज़ा चखो क्योंकि तुमने अपने रब की मुलाक़ात को भुला दिया था, यानी तुमने आख़िरत का इंकार किया और अंबिया-ए-किराम की मुख़ालफ़त की।
यह ज़ाहिर करता है कि आख़िरत को भुलाना तमाम गुनाहों की जड़ है, क्योंकि यही इंसान को ग़फ़लत और ना-फ़रमानी में धकेलता है।
इस आयत से दो अहम शरई अहकाम मालूम होते हैं:
जहन्नुम का दायमी अज़ाब सिर्फ़ काफ़िरों के लिए मख़्सूस है जिन्होंने ईमान को ठुकराया और कुफ़्र किया।
काफ़िरों के वे ना-बालिग़ बच्चे जो बचपन ही में फ़ौत हो गए, जहन्नुम में नहीं जाएंगे, क्योंकि जहन्नुम उन लोगों के लिए है जो कुफ़्र और गुनाह के मुर्तकिब हुए हों, जबकि मासूम बच्चों से कोई कुफ़्र या गुनाह सरज़द नहीं हुआ।
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