कुरान - 32:15 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
إِنَّمَا يُؤۡمِنُ بِـَٔايَٰتِنَا ٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُواْ بِهَا خَرُّواْۤ سُجَّدٗاۤ وَسَبَّحُواْ بِحَمۡدِ رَبِّهِمۡ وَهُمۡ لَا يَسۡتَكۡبِرُونَ۩

Transliteration: (Innamaa yu'minu bi aayaatinal lazeena izaa zukkiroo bihaa kharroo sujjadanw wa sabbahoo bihamdi rabbihim wa hum laa yastakbiroon (make sajda))

हमारी आयात पर तो बस वही लोग ईमान लाते हैं [31] कि जब उन्हें उनके ज़रिये नसीहत की जाती है तो वे सजदे में गिर पड़ते हैं [32] और अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते हैं और आजिज़ होकर उसकी बुजु़र्गी बयान करते हैं [33]। (इसे पढ़ने और सुनने वाले पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब हो जाता है)। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 15

"हमारी आयात पर तो बस वही लोग ईमान लाते हैं [31] कि जब उन्हें उनके ज़रिये नसीहत की जाती है तो वे सजदे में गिर पड़ते हैं [32] और अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते हैं और आजिज़ होकर उसकी बुजु़र्गी बयान करते हैं [33]।"
(इसे पढ़ने और सुनने वाले पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब हो जाता है।)

[31] सच्चे मोमिन ही आयात का एहतराम करते हैं

इसका मफ़हूम यह है: ऐ काफ़िरो! अगर तुम्हें दोबारा दुनिया में भी भेज दिया जाए, तब भी तुम ईमान नहीं लाओगे; क्योंकि सच्चा ईमान उन्हीं दिलों में उतरता है जो इलाही आयात और निशानियों के आगे झुकने वाले होते हैं।

[32] शुक्र और ताज़ीम का सजदा

यहाँ सजदा दो मक़ासिद के तहत किया जाता है:

  • या तो ईमान की नेअमत मिलने पर शुक्रगुज़ारी के तौर पर, या

  • अल्लाह तआला की अज़मत-ओ-बुजु़र्गी के इज़हार और ताज़ीम के लिए।

यह सजदा नमाज़ का हिस्सा नहीं, बल्कि तिलावत-ए-सजदा है।
लिहाज़ा जब यह आयत पढ़ी या सुनी जाए तो सजदा-ए-तिलावत वाजिब हो जाता है।

[33] आजिज़ाना फ़रमांबरदारी का मुज़ाहरा

यह आजिज़ी और तस्बीह दो तरह से ज़ाहिर होती है:

  • हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की कामिल इताअत और फ़रमांबरदारी से, और

  • हक़्क़ानी उलेमा की हिदायात पर अमल करने से, जो अपने रब की सच्ची इताअत और हम्द का अमली इज़हार है।

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