Transliteration: (Innamaa yu'minu bi aayaatinal lazeena izaa zukkiroo bihaa kharroo sujjadanw wa sabbahoo bihamdi rabbihim wa hum laa yastakbiroon (make sajda))
"हमारी आयात पर तो बस वही लोग ईमान लाते हैं [31] कि जब उन्हें उनके ज़रिये नसीहत की जाती है तो वे सजदे में गिर पड़ते हैं [32] और अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते हैं और आजिज़ होकर उसकी बुजु़र्गी बयान करते हैं [33]।"
(इसे पढ़ने और सुनने वाले पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब हो जाता है।)
इसका मफ़हूम यह है: ऐ काफ़िरो! अगर तुम्हें दोबारा दुनिया में भी भेज दिया जाए, तब भी तुम ईमान नहीं लाओगे; क्योंकि सच्चा ईमान उन्हीं दिलों में उतरता है जो इलाही आयात और निशानियों के आगे झुकने वाले होते हैं।
यहाँ सजदा दो मक़ासिद के तहत किया जाता है:
या तो ईमान की नेअमत मिलने पर शुक्रगुज़ारी के तौर पर, या
अल्लाह तआला की अज़मत-ओ-बुजु़र्गी के इज़हार और ताज़ीम के लिए।
यह सजदा नमाज़ का हिस्सा नहीं, बल्कि तिलावत-ए-सजदा है।
लिहाज़ा जब यह आयत पढ़ी या सुनी जाए तो सजदा-ए-तिलावत वाजिब हो जाता है।
यह आजिज़ी और तस्बीह दो तरह से ज़ाहिर होती है:
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की कामिल इताअत और फ़रमांबरदारी से, और
हक़्क़ानी उलेमा की हिदायात पर अमल करने से, जो अपने रब की सच्ची इताअत और हम्द का अमली इज़हार है।
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