Transliteration: (Wa law taraaa izil mujrimoona naakisoo ru'oosihim 'inda rabbihim rabbanaaa absarnaa wa sami'naa farji'naa na'mal saalihan innaa mooqinoon)
"और काश आप देखें जब मुजरिम [24] अपने रब के सामने अपने सर झुकाए हुए होंगे [25] (और कहेंगे), 'ऐ हमारे रब! अब हमने देख लिया और सुन लिया [26], पस हमें (दुनिया में) वापस भेज दे ताकि हम नेक अमल करें, बेशक अब हमें पूरा यक़ीन आ चुका है।"
यहाँ लफ़्ज़ “मुजरिम” से मुराद ख़ास तौर पर मुशरिक और काफ़िर हैं।
अगरचे इस लफ़्ज़ के आम इस्तेमाल में हर तरह के गुनहगार शामिल होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा जुर्म कुफ़्र और हक़ का इंकार है, जो इंसान के दिल और रूह दोनों को सियाह कर देता है।
क़यामत के दिन हर शख़्स अल्लाह तआला के हुज़ूर सर झुकाए खड़ा होगा।
ताहम काफ़िर शर्मिंदगी और पछतावे से सर झुकाएंगे, जबकि नेकोकार मोमिन ताज़ीम और आजिज़ी के सबब सर झुकाएंगे।
यहाँ यह जुमला काफ़िरों की ज़िल्लत और रुसवाई को बयान करता है।
काफ़िर कहेंगे कि अब हमने ग़ैब की हक़ीक़तों को अपनी आँखों से देख लिया और फ़रिश्तों का कलाम सुन लिया—जो बातें पहले सिर्फ़ अंबिया-ए-किराम के ज़रिए बताई गई थीं।
ताहम उस वक़्त का यह यक़ीन बे-कार होगा, क्योंकि सच्चा ईमान वह है जो रसूल के फ़रमान पर बग़ैर देखे (बिल-ग़ैब) लाया जाए, न कि आँखों से देख लेने के बाद।
ईमान की अस्ल यह है कि पर्दा उठने से पहले तस्दीक़ की जाए, पर्दा हटने के बाद नहीं।
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