Transliteration: (Qul yawmal fath hi laa yanfa'ul lazeena kafarooo eemaanuhum wa laa hum yunzaroon)
"आप फ़रमा दीजिए, 'फ़ैसले (फ़तह) के दिन काफ़िरों को उनका ईमान लाना कोई नफ़ा न देगा [56] और न उन्हें कोई मोहलत दी जाएगी [57]।"
अगर "यवमुल फ़तह" (फ़तह के दिन) से मुराद फ़तह-ए-मक्का ली जाए, तो यह आयत बताती है कि अगर काफ़िर उस आख़िरी वक़्त में महज़ अपनी जान बचाने के लिए ईमान का इज़हार करें, तो ऐसा ईमान क़बूल नहीं होगा।
उनका यह ऐलान ग़ैर-मुख़्लिसाना समझा जाएगा, बिल्कुल उस ईमान की तरह जो इलाही अज़ाब देख लेने के बाद लाया जाए, जिसकी कोई दीनी हैसियत नहीं होती।
इसकी एक तारीख़ी मिसाल:
फ़तह-ए-मक्का के मौक़े पर जब बनू कनाना के कबीले ने भागने की कोशिश की और बाद में ईमान लाने का दावा किया, तो हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने दबाव और ख़ौफ़ की हालत में किए गए इस दावे को क़बूल नहीं फ़रमाया, और उनसे निबटा गया। (तफ़सीर जमल, ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)
और अगर "यवमुल फ़तह" से मुराद क़यामत का दिन हो, तो आयत का साफ़ मफ़हूम यह है कि उस दिन काफ़िरों का ईमान हरगिज़ क़बूल नहीं किया जाएगा, क्योंकि ईमान और तौबा की मुद्दत ख़त्म हो चुकी होगी।
इससे यह शरई मसला भी मालूम होता है कि अगर कोई काफ़िर जंग या क़ैद के दौरान सिर्फ़ मोमिनों को धोखा देने और अपनी जान बचाने के लिए कलिमा पढ़े, तो उसका यह ऐलान सच्चा नहीं और ना-क़ाबूल-ए-एअतिबार है।
लिहाज़ा ऐसे मौक़ों पर उस पर हुक्म-ए-शरई नाफ़िज़ करना जायज़ है।
मिसाल के तौर पर: जंग में अगर कोई दुश्मन गिरफ़्तारी के वक़्त कलिमा पढ़े, लेकिन यह वाज़ेह हो कि वह सिर्फ़ मौत के डर से ऐसा कर रहा है, तो उसके इज़हार में इख़्लास नहीं होता, और सहाबा-ए-किराम के अमली तरीक़े के मुताबिक़ सज़ा देना जायज़ है।
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