कुरान - 32:28 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا ٱلۡفَتۡحُ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ

Transliteration: (Wa yaqooloona mataa haazal fath hu in kuntum saadiqeen)

और वे कहते हैं, 'यह फ़ैसला (फ़तह) कब होगी अगर तुम सच्चे हो [55]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 28

"और वे कहते हैं, 'यह फ़ैसला (फ़तह) कब होगी अगर तुम सच्चे हो [55]?'"

[55] इलाही फ़तह के वादे का मज़ाक़ उड़ाना

काफ़िर मोमिनीन से तंज़ और मज़ाक़ के तौर पर पूछते थे:
"क्या अल्लाह वाकई हमारे दरमियान फ़ैसला करेगा? क्या तुम वाकई हम पर ग़ालिब आओगे? अगर ऐसा है तो यह फ़तह कब होगी?"
उनका मक़सद हक़ीक़त को समझना नहीं था, बल्कि महज़ इस्तेहज़ा और मज़ाक़ उड़ाना था।

वे इलाही मदद के वादे और क़यामत के आख़िरी फ़ैसले में शक करते थे, और ऐसे सवालात से मोमिनों को हक़ीर समझना और हुज़ूर ﷺ के पैग़ाम को झुठलाना चाहते थे।
यह आयत उनके तकब्बुर और हठधर्मी की तस्वीर खींचती है, बावजूद इसके कि खुली निशानियाँ उनके सामने मौजूद थीं।

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