कुरान - 26:111 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

111
۞قَالُوٓاْ أَنُؤۡمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلۡأَرۡذَلُونَ

Transliteration: (Qaalooo anu'minu laka wattaba 'akal arzaloon)

वे बोले, 'क्या हम तुम पर ईमान ले आएं जबकि तुम्हारी पैरवी (निचले तबक़े के) कमज़ोर लोगों ने की है [113]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 111 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 111

"वे बोले, 'क्या हम तुम पर ईमान ले आएं जबकि तुम्हारी पैरवी कमज़ोर लोगों ने की है [113]?'"

[113] मुतकब्बिर सरदारों का तबक़ाती गुरूर और तकब्बुर

क़ौम-ए-नूह के दौलतमंद और मगरूर सरदारों ने ईमान लाने से इंकार करते हुए यह बेहुदा ऐतराज़ उठाया कि तुम्हारे साथ तो ग़रीब, मिस्कीन, मज़दूर और कमज़ोर लोग बैठे हैं, हम अशराफ़ व रईस होकर इन हक़ीर लोगों के बराबर कैसे बैठ सकते हैं? तकब्बुर और तबक़ाती इम्तियाज़ हमेशा से हक़ के क़बूल करने में सबसे बड़ी रुकावट रहा है।

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