कुरान - 42:10 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

10
وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّي عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُ وَإِلَيۡهِ أُنِيبُ

Transliteration: (Wa makh-talaftum feehi min shai'in fahukmuhooo ilallaah; zaalikumul laahu Rabbee 'alaihi tawakkaltu wa ilaihi uneeb)

और जिस बात में भी तुम इख़्तिलाफ़ करो, तो उसका फ़ैसला अल्लाह ही के हवाले है [20]; यही अल्लाह मेरा रब है [21], उसी पर मैंने भरोसा किया और उसी की तरफ़ मैं रुजूअ करता हूं [22]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 10 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 10

और जिस बात में भी तुम इख़्तिलाफ़ करो, तो उसका फ़ैसला अल्लाह ही के हवाले है [20]; यही अल्लाह मेरा रब है [21], उसी पर मैंने भरोसा किया और उसी की तरफ़ मैं रुजूअ करता हूं [22]!

[20] तमाम इख़्तिलाफ़ात का फ़ैसला बारगाह-ए-इलाही में

हक़ और बातिल, ईमान और कुफ़्र का अमली और क़तई फ़ैसला अल्लाह तआला क़यामत के दिन फ़रमाएगा—मोमिनीन को जन्नत अता फ़रमा कर और काफ़िरों को जहन्नम में दाखिल कर के।

[21] तवक्कुल के दर्जात और हुज़ूर ﷺ का अमली नमूना

उलमा का तवक्कुल असबाब को इख़्तियार करने के बाद अल्लाह पर भरोसा करना है, जबकि सूफ़ी-ए-किराम का तवक्कुल असबाब से नज़र हटा कर सिर्फ़ मुसब्बिबुल असबाब पर नज़र रखना है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी हयात-ए-तैयबा में इन दोनों मक़ामात का कामिल नमूना पेश फ़रमाया।

[22] हमेशा रब की तरफ़ रुजूअ

बंदा-ए-मोमिन हर हाल में अपने रब पर तवक्कुल करता है और हर मामले में उसी की तरफ़ रुजूअ करता है, क्योंकि जो कुछ मिलता है वह उसी के फ़ज़्ल से मिलता है।

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