कुरान - 42:8 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

8
وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمۡ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ وَلَٰكِن يُدۡخِلُ مَن يَشَآءُ فِي رَحۡمَتِهِۦۚ وَٱلظَّـٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٍ

Transliteration: (Wa law shaaa'al laahu laja'alahum ummatanw waahi datanw walaakiny yudkhilumany yashaaa'u fee rahmatih; waz zaalimoona maa lahum minw waliyyinw wa laa naseer)

और अगर अल्लाह चाहता तो उन सबको एक ही उम्मत (दीन पर) बना देता, लेकिन वह जिसे चाहता है अपनी रहमत में दाख़िल फ़रमाता है [14]; और ज़ालिमों के लिए न कोई मददगार होगा और न कोई हिमायती [15]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 8 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 8

और अगर अल्लाह चाहता तो उन सबको एक ही उम्मत (दीन पर) बना देता, लेकिन वह जिसे चाहता है अपनी रहमत में दाख़िल फ़रमाता है [14]; और ज़ालिमों के लिए न कोई मददगार होगा और न कोई हिमायती [15]!

[14] रिज़्क़ आम है मगर हिदायत ख़ास रहमत है

अल्लाह तआला दुनियावी रिज़्क़ काफ़िर और मोमिन सबको अता फ़रमाता है, मगर हिदायत और ईमान अपनी मख़्सूस रहमत से उसी को नसीब फ़रमाता है जो तलबगार हो। इसलिए बंदे को चाहिए कि वह हिदायत और ईमान की फ़िक्र करे।

[15] ज़ालिमों (काफ़िरों) की बे-यारो-मददगारी

'ज़ालिमों' से मुराद काफ़िर हैं। आख़िरत में उनका कोई दोस्त, हामी या मददगार न होगा जो उन्हें अज़ाब से बचा सके। यह बेबसी ख़ुद उनके लिए एक अज़ाब होगी। इसके बरअक्स मोमिनीन के लिए अल्लाह, उसके रसूल और नेक बंदे मददगार हैं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now