Transliteration: (Shara'a lakum minad deeni maa wassaa bihee Noohanw wallazeee awhainaaa ilaika wa maa wassainaa biheee Ibraaheema wa Moosa wa 'Eesaaa an aqeemud deena wa laa tatafarraqoo feeh; kabura 'alal mushrikeena maa tad'oohum ilaih; Allaahu yajtabee ilaihi mai yashaaa'u wa yahdeee ilaihi mai yuneeb)
उसने तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡ लिठवही दीन मà¥à¤•़रà¥à¤°à¤° फ़रमाया जिसकी उसने नूह को वसीयत की थी [29], और जिसकी हमने आपकी तरफ़ वही à¤à¥‡à¤œà¥€ है [30], और जिसकी हमने इबà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥€à¤® और मूसा और ईसा को वसीयत की थी [31] कि: इस दीन को क़ायम रखो [32] और इसमें तफ़रक़ा (फूट) न डालो [33]; मà¥à¤¶à¤°à¤¿à¤•ों पर वह बात बहà¥à¤¤ à¤à¤¾à¤°à¥€ गà¥à¤œà¤¼à¤°à¤¤à¥€ है जिसकी तरफ़ आप उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ बà¥à¤²à¤¾à¤¤à¥‡ हैं [34]; अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ जिसे चाहता है अपनी तरफ़ चà¥à¤¨ लेता है और जो उसकी तरफ़ रà¥à¤œà¥‚अ करे उसे अपनी राह दिखा देता है [35]!
हज़रत नूह अलैहिसà¥à¤¸à¤²à¤¾à¤® पहले शरीअत वाले रसूल हैं जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कà¥à¤«à¤¼à¥à¤«à¤¼à¤¾à¤° को दावत दी और उनकी नाफ़रमान क़ौम पर अज़ाब आया। इसलिठउनका ज़िकà¥à¤° ख़ास तौर पर फ़रमाया गया।
तमाम अंबिया का दीन यानी बà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤¦à¥€ अक़ाइद (तौहीद, रिसालत, आख़िरत) à¤à¤• ही रहा है। फ़रà¥à¤•़ सिरà¥à¤«à¤¼ अहकाम और फ़à¥à¤°à¥‚आत (शरीअत) में हà¥à¤† है। बà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤¦à¥€ अक़ाइद को दीन कहा जाता है और अमली अहकाम को शरीअत।
इन पांच जलीलà¥à¤²-क़दà¥à¤° पैग़ंबरों (हज़रत नूह, हज़रत इबà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥€à¤®, हज़रत मूसा, हज़रत ईसा अलैहिमà¥à¤¸à¥à¤¸à¤²à¤¾à¤® और सैयदे आलम ï·º) को उलà¥à¤²-अज़à¥à¤® रसूल कहा जाता है जिनकी अज़मत सबसे नà¥à¤®à¤¾à¤¯à¤¾à¤‚ है।
यानी हक़ीक़ी अक़ाइद पर क़ाइम रहो और शरीअत के अहकाम को अपनी ज़िंदगी में नाफ़िज़ रखो।
इतà¥à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¦ और यकजहती अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ की रहमत है और अक़ाइद में फूट डालना अज़ाब का सबब है। अहले सà¥à¤¨à¥à¤¨à¤¤ वल जमाअत के हक़ीक़ी रासà¥à¤¤à¥‡ पर मà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¹à¤¿à¤¦ रहना वाजिब है।
मà¥à¤¶à¤°à¤¿à¤•़ीन हà¥à¤œà¤¼à¥‚र ï·º की अमानत व दियानत के मोतरिफ़ थे, मगर बà¥à¤¤à¤ªà¤°à¤¸à¥à¤¤à¥€ की तरदीद और तौहीद की दावत उन पर बहà¥à¤¤ à¤à¤¾à¤°à¥€ गà¥à¤œà¤¼à¤°à¤¤à¥€ थी।
नबà¥à¤µà¥à¤µà¤¤ और आला विलायत अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ का फ़ज़à¥à¤²-à¤-मख़à¥à¤¸à¥‚स (इसà¥à¤¤à¤¿à¤«à¤¼à¤¾) है जो बंदे की मेहनत से नहीं बलà¥à¤•ि महज़ अतिया-à¤-इलाही से मिलती है; जबकि आम हिदायत तलब और अमल से हासिल होती है।
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