कुरान - 42:15 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
فَلِذَٰلِكَ فَٱدۡعُۖ وَٱسۡتَقِمۡ كَمَآ أُمِرۡتَۖ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَهُمۡۖ وَقُلۡ ءَامَنتُ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن كِتَٰبٖۖ وَأُمِرۡتُ لِأَعۡدِلَ بَيۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمۡۖ لَنَآ أَعۡمَٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَٰلُكُمۡۖ لَا حُجَّةَ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ يَجۡمَعُ بَيۡنَنَاۖ وَإِلَيۡهِ ٱلۡمَصِيرُ

Transliteration: (Falizaalika fad'u wastaqim kamaaa umirta wa laa tattabi' ahwaaa'ahum wa qul aamantu bimaaa anzalal laahu min Kitaab, wa umirtu li a'dila bainakum Allaahu Rabbunaa wa Rabbukum lanaaa a'maa lunaa wa lakum a'maalukum laa hujjata bainanaa wa baina kumul laahu yajma'u bainanaa wa ilaihil maseer)

पस इसी (दीन) की तरफ़ आप (लोगों को) बुलाइए [40] और साबित-क़दम रहिए [41] जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है, और उनकी ख़्वाहिशात की पैरवी न कीजिए [42]; और फ़रमा दीजिए: मैं हर उस किताब पर ईमान लाया जो अल्लाह ने नाज़िल फ़रमाई है [43], और मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं तुम्हारे दरमियान इंसाफ़ करूं [44]; अल्लाह ही हमारा भी रब है और तुम्हारा भी रब है [45]; हमारे लिए हमारे आमाल हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल [46]; हमारे और तुम्हारे दरमियान कोई झगड़ा नहीं [47]; अल्लाह हम सबको इकट्ठा करेगा [48] और उसी की तरफ़ लौटना है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 15

पस इसी (दीन) की तरफ़ आप (लोगों को) बुलाइए [40] और साबित-क़दम रहिए [41] जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है, और उनकी ख़्वाहिशात की पैरवी न कीजिए [42]; और फ़रमा दीजिए: मैं हर उस किताब पर ईमान लाया जो अल्लाह ने नाज़िल फ़रमाई है [43], और मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं तुम्हारे दरमियान इंसाफ़ करूं [44]; अल्लाह ही हमारा भी रब है और तुम्हारा भी रब है [45]; हमारे लिए हमारे आमाल हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल [46]; हमारे और तुम्हारे दरमियान कोई झगड़ा नहीं [47]; अल्लाह हम सबको इकट्ठा करेगा [48] और उसी की तरफ़ लौटना है।

[40] आलमी दावत-ए-हक़

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को हुक्म हुआ कि आप तमाम इंसानियत को दीने इस्लाम और तौहीद की तरफ़ दावत दें।

[41] इस्तक़ामत: हज़ारों करामातों से अफ़ज़ल

मुख़ालिफ़ीन के हठ और ज़ुल्म के मुक़ाबले में साबित-क़दम रहना अंबिया की शान है। सूफ़ी-ए-किराम फ़रमाते हैं: 'अल-इस्तक़ामतु फ़ौक़ल करामा' यानी इस्तक़ामत हज़ार करामातों से बढ़कर है।

[42] नफ़्सानी ख़्वाहिशात से मुकम्मल परहेज़

काफ़िरों की बातिल रस्मों और ख़्वाहिशात की पैरवी से मुकम्मल एतराज़ का हुक्म दिया गया।

[43] तमाम आसमानी किताबों की तस्दीक़

हुज़ूर ﷺ ने एलान फ़रमाया कि मैं तमाम आसमानी किताबों (तौरात, इंजील, ज़बूर वग़ैरा) पर उनके अस्ल रूप में ईमान रखता हूं।

[44] मुंसिफ़-ए-आज़म और आदिलाना निज़ाम

हुज़ूर ﷺ को तमाम इंसानों के दरमियान इंसाफ़ का हुक्म हुआ। आपने ज़ालिमाना रसूमात (जैसे बच्चियों को ज़िंदा दफ़्न करना) का ख़ातमा फ़रमाया।

[45] [46] [47] [48] हुज्जत तमाम और मैदान-ए-हश्र

हक़ पूरी तरह वाज़ेह हो चुका है। अब किसी बेजा बहस की ज़रूरत नहीं। हर एक को अपने आमाल का सिला मिलना है और क़यामत के दिन सब अल्लाह की अदालत में पेश होंगे।

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