कुरान - 42:17 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

17
ٱللَّهُ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ وَٱلۡمِيزَانَۗ وَمَا يُدۡرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِيبٞ

Transliteration: (Allahul lazeee anzalal Kitaaba bilhaqqi wal Meezaan; wa ma yudreeka la'allas Saa'ata qareeb)

अल्लाह ही है जिसने हक़ के साथ किताब और (अदल का) तराज़ू नाज़िल फ़रमाया [52]; और आपको क्या ख़बर, शायद क़ियामत क़रीब ही हो [53]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 17 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 17

अल्लाह ही है जिसने हक़ के साथ किताब और (अदल का) तराज़ू नाज़िल फ़रमाया [52]; और आपको क्या ख़बर, शायद क़ियामत क़रीब ही हो [53]!

[52] मीज़ान-ए-अदल: शरीअत और साहिबे शरीअत ﷺ

'तराज़ू' (मीज़ान) से मुराद इंसाफ़ का पैमाना और शरीअत-ए-मुबारका है। मुफ़स्सिरीन ने फ़रमाया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ात-ए-मुबारका ईमान की हक़ीक़ी कसौटी और तराज़ू है। जिसकी मुहब्बत हुज़ूर से है उसका ईमान वज़नी है, और जो महरूम है उसका पलड़ा ख़ाली है।

[53] क़ियामत की क़ुर्बत का यक़ीन

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आमद ख़ुद क़ियामत की निशानी है। आप ﷺ ने फ़रमाया: 'मेरी बअसत और क़ियामत इन दो उंगलियों की तरह मिली हुई हैं।' क़ियामत इंतिहाई क़रीब है, लिहाज़ा इंसान को ग़फ़लत छोड़कर आमाल की तैयारी करनी चाहिए।

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