कुरान - 42:25 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
وَهُوَ ٱلَّذِي يَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَيَعۡفُواْ عَنِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ وَيَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُونَ

Transliteration: (Wa Huwal lazee yaqbalut tawbata 'an 'ibaadihee wa ya'foo 'anis saiyiaati wa ya'lamu maa taf'aloon)

और वही है जो अपने बंदों की तौबा क़बूल फ़रमाता है [80] और गुनाहों को मुआफ़ फ़रमाता है [81] और जो कुछ तुम करते हो उसे ख़ूब जानता है [82]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 25

और वही है जो अपने बंदों की तौबा क़बूल फ़रमाता है [80] और गुनाहों को मुआफ़ फ़रमाता है [81] और जो कुछ तुम करते हो उसे ख़ूब जानता है [82];

[80] तौबा की क़बूलियत और उसकी शराइत

तौबा से हर गुनाह मुआफ़ हो जाता है। तौबा के लिए चार शर्तें ज़रूरी हैं: (1) गुनाह पर दिली शर्मिंदगी, (2) फ़ौरन गुनाह छोड़ देना, (3) आइंदा कभी न करने का पक्का इरादा, और (4) अगर हुक़ूक़ुल इबाद हैं तो उन्हें अदा करना या मुआफ़ कराना। कुफ़्र की तौबा ईमान लाना है।

[81] गुनाहों की मुआफ़ी

कबीरा गुनाह तौबा से मुआफ़ होते हैं और सग़ीरा गुनाह नमाज़ व वज़ू जैसी इबादतों से झड़ जाते हैं। अल्लाह तआला तौबा करने वालों को महबूब रखता है।

[82] हर अमल का इल्म-ए-इलाही में होना

अगर बंदा गुनाह करते वक़्त यह ध्यान रखे कि अल्लाह मुझे देख रहा है, तो कभी गुनाह की जुर्रत न करे।

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