कुरान - 42:26 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
وَيَسۡتَجِيبُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضۡلِهِۦۚ وَٱلۡكَٰفِرُونَ لَهُمۡ عَذَابٞ شَدِيدٞ

Transliteration: (Wa yastajeebul lazeena aamanoo wa 'amilu saalihaati wa yazeeduhum min fadlih; wal kaafiroona lahum 'azaabun shadeed)

और वह उन लोगों की दुआ क़बूल फ़रमाता है जो ईमान लाए और उन्होंने नेक आमाल किए [83], और उन्हें अपने फ़ज़ल से और ज़्यादा अता फ़रमाता है [84]; और काफ़िरों के लिए सख़्त अज़ाब है [85]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 26

और वह उन लोगों की दुआ क़बूल फ़रमाता है जो ईमान लाए और उन्होंने नेक आमाल किए [83], और उन्हें अपने फ़ज़ल से और ज़्यादा अता फ़रमाता है [84]; और काफ़िरों के लिए सख़्त अज़ाब है [85]!

[83] नेक बंदों की दुआओं की फ़ौरी क़बूलियत

जो लोग अल्लाह के अहकाम पर अमल करते हैं और तक़्वा इख़्तियार करते हैं, अल्लाह तआला उनकी दुआओं को बहुत जल्द शरफ़-ए-क़बूलियत बख़्शता है। दुआ की क़बूलियत के लिए हलाल लुक़्मा और नेक अमल लाज़मी है।

[84] तलब से बढ़कर फ़ज़्ल व करम

अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को उनकी मांगी हुई दुआ से भी बढ़कर अपने फ़ज़ल व एहसान से नवाज़ता है।

[85] काफ़िरों की महरूमी और अज़ाब

काफ़िरों की दुआएं हक़ के ख़िलाफ़ होने की वजह से रद्द कर दी जाती हैं और आख़िरत में उनके लिए सख़्त तरीन अज़ाब तैयार है।

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