कुरान - 42:27 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
۞وَلَوۡ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزۡقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٖ مَّا يَشَآءُۚ إِنَّهُۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرُۢ بَصِيرٞ

Transliteration: (Wa law basatal laahur rizqa li'ibaadihee labaghaw fil ardi wa laakiny yunazzilu biqadarim maa yashaaa'; innahoo bi'ibaadihee Khabeerun Baseer)

और अगर अल्लाह अपने तमाम बंदों के लिए रिज़्क़ कुशादा (फ़राख़) कर देता, तो वे ज़मीन में सरकशी (फ़साद) मचाने लगते [86], लेकिन वह एक अंदाज़े के मुताबिक़ जितनी चाहता है नाज़िल फ़रमाता है; बेशक वह अपने बंदों से पूरा बा-ख़बर, ख़ूब देखने वाला है [87]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 27

और अगर अल्लाह अपने तमाम बंदों के लिए रिज़्क़ कुशादा (फ़राख़) कर देता, तो वे ज़मीन में सरकशी (फ़साद) मचाने लगते [86], लेकिन वह एक अंदाज़े के मुताबिक़ जितनी चाहता है नाज़िल फ़रमाता है; बेशक वह अपने बंदों से पूरा बा-ख़बर, ख़ूब देखने वाला है [87]।

[86] दुनियावी फ़राख़ी और नफ़्स की सरकशी

अगर दुनिया में हर इंसान को बेहिसाब दौलत और ऐश व इशरत मिल जाती, तो नफ़्स की सरकशी की वजह से लोग तकब्बुर में मुब्तिला होकर एक दूसरे पर ज़ुल्म करते और ज़मीन पर फ़साद व ख़ूंरेज़ी मच जाती। रिज़्क़ का नपा-तुला होना ख़ुद अल्लाह तआला की एक बड़ी हिकमत और बंदों पर रहमत है।

[87] हकीम व ख़बीर की हिकमत-ए-अता

अल्लाह तआला अपने हर बंदे की सलाहियत और मिज़ाज को ख़ूब जानता है। जैसे एक माहिर तबीब हर मरीज़ को शहद नहीं देता क्योंकि बाज़ के लिए वह नुक़सानदेह होता है, उसी तरह अल्लाह तआला जिसके लिए अमीरी बेहतर समझता है उसे अमीर बनाता है और जिसके लिए ग़रीबी बेहतर होती है उसे उसी हाल में रखता है।

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