कुरान - 42:38 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

38
وَٱلَّذِينَ ٱسۡتَجَابُواْ لِرَبِّهِمۡ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمۡرُهُمۡ شُورَىٰ بَيۡنَهُمۡ وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ

Transliteration: (Wallazeenas tajaaboo li Rabbihim wa aqaamus Salaata wa amruhum shooraa bainahum wa mimmaa razaqnaahum yunfiqoon)

और जिन्होंने अपने रब के हुक्म को क़बूल किया [108] और नमाज़ क़ायम की, और उनका निज़ाम आपस के मशवरे (शूरा) से चलता है [109], और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं [110]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 38 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 38

और जिन्होंने अपने रब के हुक्म को क़बूल किया [108] और नमाज़ क़ायम की, और उनका निज़ाम आपस के मशवरे (शूरा) से चलता है [109], और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं [110];

[108] अंसार-ए-किराम की फ़रमांबरदारी

यह आयत अंसार-ए-मदीना के हक़ में नाज़िल हुई जिन्होंने हुज़ूर ﷺ की दावत पर लब्बैक कहा और जान व माल से इस्लाम की नुसरत की। रसूल की दावत को क़बूल करना अल्लाह की दावत को क़बूल करना है।

[109] शूरा यानी बाहमी मशवरे का उसूल

मुसलमानों के इज्तिमाई, सियासी और मुआशरती मामलात (जैसे ख़िलाफ़त, जिहाद, इंतिज़ाम) बाहमी मशवरे से तय होते हैं। अलबत्ता शरीअत के नसूस और क़तई अहकाम में मशवरे की गुंजाइश नहीं, वे हर हाल में लाज़िम हैं।

[110] राह-ए-ख़ुदा में इन्फ़ाक़

मोमिन अपने हलाल रिज़्क़ में से ज़कात, सद्क़ात और दीनी ख़िदमात में ख़र्च करते हैं। सारा माल ख़र्च करना आम लोगों पर फ़र्ज़ नहीं, थोड़ा ख़र्च करना भी काफ़ी है; अलबत्ता हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर जैसी हस्तियां सब कुछ क़ुर्बान करने का हौसला रखती हैं।

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