कुरान - 42:40 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
وَجَزَـٰٓؤُاْ سَيِّئَةٖ سَيِّئَةٞ مِّثۡلُهَاۖ فَمَنۡ عَفَا وَأَصۡلَحَ فَأَجۡرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Wa jazaaa'u saiyi'atin saiyi'atum misluha faman 'afaa wa aslaha fa ajruhoo 'alal laah; innahoo laa yuhibbuz zaalimeen)

और बुराई का बदला उसी जैसी बुराई है [112]; पस जिसने मुआफ़ कर दिया और सुलह व इस्लाह कर ली, तो उसका अज्र अल्लाह के ज़िम्मे है [113]; बेशक वह ज़ालिमों को पसंद नहीं फ़रमाता [114]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 40

और बुराई का बदला उसी जैसी बुराई है [112]; पस जिसने मुआफ़ कर दिया और सुलह व इस्लाह कर ली, तो उसका अज्र अल्लाह के ज़िम्मे है [113]; बेशक वह ज़ालिमों को पसंद नहीं फ़रमाता [114]!

[112] बराबरी का बदला शरअन जुर्म नहीं

ज़्यादती के बदले में उतनी ही तकलीफ़ देना जिसे 'बुराई का बदला' कहा गया, शरअन गुनाह नहीं बल्कि अद्ल है। बदला ज़्यादती से ज़्यादा नहीं होना चाहिए।

[113] अफ़्व व सुलह का अज़ीम सवाब

जो शख़्स इंतिक़ाम की ताक़त के बावजूद मुआफ़ कर दे और आपस में सुलह करा दे, उसका अज्र अल्लाह तआला के करम पर है जिसकी कोई इंतिहा नहीं।

[114] ज़ुल्म करने वाले महरूम-ए-रहमत

अल्लाह तआला ज़्यादती करने वालों और हद से बढ़ने वालों को हरगिज़ पसंद नहीं फ़रमाता।

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