कुरान - 42:42 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَظۡلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَيَبۡغُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّۚ أُوْلَـٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ

Transliteration: (Innamas sabeelu 'alal lazeena yazlimoonan naasa wa yabghoona fil ardi bighairil haqq; ulaaa'ika lahum 'azaabun aleem)

(इल्ज़ाम और सज़ा का) रास्ता तो सिर्फ़ उन लोगों पर है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं [116] और ज़मीन में नाहक़ सरकशी फैलाते हैं [117]; यही लोग हैं जिनके लिए दर्दनाक अज़ाब है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 42

(इल्ज़ाम और सज़ा का) रास्ता तो सिर्फ़ उन लोगों पर है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं [116] और ज़मीन में नाहक़ सरकशी फैलाते हैं [117]; यही लोग हैं जिनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।

[116] ज़ुल्म की मुख़्तलिफ़ क़िस्में और सज़ाएं

गुनाह और मुआख़ज़ा उन पर है जो बंदगान-ए-ख़ुदा पर ज़ुल्म करते हैं—ख़्वाह जानी हो, माली हो या इज़्ज़त व आबरू का नुक़सान हो। इस्लामी शरीअत में हर जुर्म की मुअय्यन सज़ाएं हैं (क़िसास, दियत, हद, ताज़ीर)।

[117] ज़ाती और क़ौमी ज़ुल्म में फ़र्क़

ज़ाती ज़ुल्म (जैसे गाली देना या मारना) में मुआफ़ करना हुस्ने अख़लाक़ है; लेकिन क़ौमी सरकशी और मुल्क व मिल्लत से बग़ावत में मुआफ़ करना फ़साद को बढ़ावा देना है। बग़ावत करने वालों को दर्दनाक सज़ा दी जाएगी।

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