कुरान - 42:43 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنۡ عَزۡمِ ٱلۡأُمُورِ

Transliteration: (Wa laman sabara wa ghafara inna zaalika lamin 'azmil umoor (section 4))

और यक़ीनन जिसने सब्र किया और मुआफ़ कर दिया [118], तो बेशक यह हिम्मत (और अज़्म) के कामों में से है [119]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 43

और यक़ीनन जिसने सब्र किया और मुआफ़ कर दिया [118], तो बेशक यह हिम्मत (और अज़्म) के कामों में से है [119]!

[118] ज़ाती मामलात में अफ़्व व दरगुज़र

अपने ज़ाती नुक़सान या ज़्यादती पर सब्र करना और तकलीफ़ देने वाले को मुआफ़ कर देना आला दर्जे की नेकी है।

[119] नफ़्स-ए-अम्मारा पर फ़तह ही हक़ीक़ी बहादुरी

इंतिक़ाम का जज़्बा भड़कने के वक़्त नफ़्स को क़ाबू में रखना सबसे बड़ा जिहाद (जिहाद-ए-अकबर) है। हज़ारों दुश्मनों को शिकस्त देना आसान है मगर अपने नफ़्स के ग़ुस्से पर ग़ालिब आना अज़ीम हिम्मत वालों का काम है।

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