कुरान - 42:37 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
وَٱلَّذِينَ يَجۡتَنِبُونَ كَبَـٰٓئِرَ ٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡفَوَٰحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُواْ هُمۡ يَغۡفِرُونَ

Transliteration: (Wallazeena yajtaniboona kabaaa'iral ismi wal fawaahisha wa izaa maa ghadiboo hum yaghfiroon)

और जो लोग कबीरा (बड़े) गुनाहों [105] और बेहयाई के कामों से बचते हैं [106], और जब उन्हें ग़ुस्सा आता है तो वे मुआफ़ कर देते हैं [107]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 37

और जो लोग कबीरा (बड़े) गुनाहों [105] और बेहयाई के कामों से बचते हैं [106], और जब उन्हें ग़ुस्सा आता है तो वे मुआफ़ कर देते हैं [107];

[105] कबीरा गुनाहों से परहेज़

कबीरा गुनाह वे हैं जिन पर शरीअत में हद मुक़र्रर है या आख़िरत में सख़्त अज़ाब की वईद आई है (जैसे शिर्क, क़त्ल, सूद, ज़िना, वालिदैन की नाफ़रमानी वग़ैरा)। मोमिन इनसे पूरी तरह बचते हैं।

[106] बेहयाई (फ़वाहिश्) से इज्तिनाब

फ़वाहिश् उन गुनाहों को कहते हैं जिनकी बुराई अक़्ल और हर मज़हब में मुसल्लमा है, जैसे बेहयाई, बदकारी और बदचलनी।

[107] ग़ुस्से के वक़्त अफ़्व व दरगुज़र

मोमिन अपने ज़ाती मामलात में ग़ुस्सा पी जाते हैं और बदला लेने की ताक़त रखने के बावजूद मुआफ़ कर देते हैं। अलबत्ता शरीअत और दीन के मुआम्लात में हुदूदुल्लाह का क़ियाम वाजिब है।

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