कुरान - 43:80 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

80
أَمۡ يَحۡسَبُونَ أَنَّا لَا نَسۡمَعُ سِرَّهُمۡ وَنَجۡوَىٰهُمۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَيۡهِمۡ يَكۡتُبُونَ

Transliteration: (Am yahsaboona annaa laa nasma'u sirrahum wa najwaahum; balaa wa Rusulunaa ladaihim yaktuboon)

क्या वे यह गुमान करते हैं कि हम उनके राज़ और उनकी सरगोशियों को नहीं सुनते? हाँ क्यों नहीं! और हमारे फ़रिश्ते उनके पास सब कुछ लिख रहे हैं [140]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 80 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 80

"क्या वे यह गुमान करते हैं कि हम उनके राज़ और उनकी सरगोशियों को नहीं सुनते? हाँ क्यों नहीं! और हमारे फ़रिश्ते उनके पास सब कुछ लिख रहे हैं [140]!"

[140] अल्लाह का मुहीत इल्म और किरामन्-कातिबीन

अल्लाह तआला से कोई राज़, कोई सरगोशी और दिल का कोई ख़्याल छुपा नहीं है। वह सब कुछ सीधे तौर पर जानता है, और इसके साथ-साथ उसके मुक़र्रर कर्दा फ़रिश्ते हर इंसान के हर अमल और बात को नाम-ए-आमाल में मुस्तक़िल दर्ज कर रहे हैं ताकि क़यामत के दिन हुज्जत पूरी हो सके।

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